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जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्॥९॥

In Hindi:

पदपाठ : जातिदेशकालव्यवहितानाम् अपि आनन्तर्यम् स्मृतिसंस्कारयोः एकरूपत्वात्॥

हिंदी में अर्थ : (जातिदेशकालव्यवहितानाम्) जाति, देश और काल के व्यवधान से युक्त वासनाओं की (अपि) भी, (स्मृतिसंस्कारयोः) स्मृति और संस्कारों के (एकरूपत्वात्) एक रूप होने के कारण, (आनन्तर्यम्) अव्यवधान = समीपता होती हैं॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : वृषदंशविपाकोदयः स्वव्यञ्जकाञ्जनाभिव्यक्तः। स यदि जातिशतेन वा दूरदेशतया वा कल्पशतेन वा व्यवहितः पुनश्च स्वव्यञ्जकाञ्जन एवोदियाद् द्रागित्येव पूर्वानुभूतवृषदंशविपाकाभिसंस्कृता वासना उपादाय व्यज्येत। कस्मात्? यतो व्यवहितानामप्यासां सदृशं कर्माभिव्यञ्जकं निमित्तीभूतमित्यानन्तर्यमेव। कुतश्च? स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्। यथानुभवास्तथा संस्काराः। ते च कर्मवासनानुरूपाः। यथा च वासनास्तथा स्मृतिरिति। जातिदेशकालव्यवहितेभ्यः संस्कारेभ्यः स्मृतिः। स्मृतेश्च पुनः संस्कारा इत्येवमेते स्मृतिसंस्काराः कर्माशयवृत्तिलाभवशाद् व्यज्यन्ते। अतश्च व्यवहितानामपि निमित्तनैमित्तिकभावानुच्छेदा-दानन्तर्यमेव सिद्धमिति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (वृषदंशविपाकोदयः) पुण्य-पाप रूप कर्मों के फल का उदय (स्वव्यञ्जकाव्यञ्जनाभिव्यक्तः) अपने व्यञ्जक = निमित्त के उपस्थित होने पर होता है। (सः) वह कर्माशय (यदि) यदि (जातिशतेन वा) सैंकड़ों भिन्न योनियों = जन्मों से, (दूरदेशतया वा) दूर देश = भिन्न लोक अथवा स्थान से, अथवा (कल्पशतेन वा) सैंकड़ों कल्पों के बीत जाने से, (व्यवहितः) व्यवहित = व्यवधान वाला होता है, (पुनः च) फिर भी (स्वव्यञ्जकाञ्जनः एव) अपने = अभिव्यक्त करने वाले निमित्त से ही (उदियात्) उदित होने से (द्रागित्येव) शीघ्र ही (पूर्वानुभूतवृषदंशविपाकाभिसंस्कृताः) पूर्व काल में अनुभूत पाप-पुण्य रूपी कर्मों के फल के भोग से निष्पन्न (वासनाः) वासनाओं को (उपादाय) लेकर ही (व्यज्येत) अभिव्यक्त हो जाता है। (कस्मात्?) किस कारण से ? (यतः) क्योंकि (व्यवहितानाम्) अनेक जन्मों, स्थानों एवं कालों से व्यवहित = व्यवधान युक्त हुई (अपि) भी (आसाम्) इन वासनाओं का (सदृशम् कर्म) समान कर्म ही (अभिव्यञ्जकम्) अभिव्यञ्जक = अभिव्यक्त करने वाला (निमित्तोभूतम्) निमित्त बन जाता है; (इति) इस लिए (आनन्तर्यम् एव) वासनाओं की समीपता = निरन्तरता ही होती है।

(कुतः च) और ऐसा क्यों होता है? क्योंकि (स्मृतिसंस्कारयोः) स्मृति और संस्कारों की (एकरूपत्वात्) एकरूपता होने से। (यथा) जिस प्रकार के (अनुभवाः) अनुभव होते हैं, (तथा) उसी प्रकार के (संस्काराः) संस्कार होते हैं। (च) और (ते) वे संस्कार (कर्मवासनानुरूपाः) कर्म की वासना के अनुरूप होते हैं। (च) और (यथा) जिस प्रकार की (वासनाः) वासना होती है, (तथा) उसी प्रकार की (स्मृतिः) स्मृति होती हैं। (इति) इसलिए (जातिदेशकालव्यवहितेभ्यः) जाति, देश, काल से व्यवहित = व्यवधान वाले (संस्कारेभ्यः) संस्कारों से (स्मृतिः) स्मृति होती है। (च) और (स्मृतेः) स्मृति से (पुनः) फिर (संस्काराः) संस्कार उत्पन्न होते हैं। (इति एवम्) इस प्रकार (एते) ये (स्मृतिसंस्काराः) स्मृति और संस्कार (कर्माशयवृत्तिलाभवशात्) कर्माशय वृत्ति के लाभ से = कर्माशय के फलोन्मुख होने से (व्यज्यन्ते) अभिव्यक्त = प्रकट हो जाते हैं। (च) और (अतः) इसलिये (व्यवहितानाम् अपि) जाति आदि से व्यवधान वाले होने पर भी इन वासनाओं का (निमित्तनैमित्तिकभावानुच्छेदात्) निमित्त-नैमित्तिक = कारण-कार्य भाव का उच्छेद = नाश न होने से (आनन्तर्यम् एव) अनन्तरता = समीपता ही (सिद्धम् इति) सिद्ध होती है॥

वैदिक वृत्ति : पूर्व सूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने कहा है कि वर्त्तमान काल में जीवात्मा को अपने कर्माशय के आधार पर जिस प्रकार की जाति = योनि की प्राप्ति होती है; उस योनि = शरीर में, पूर्व में प्राप्त वैसी ही योनि की वासनायें भी अभिव्यक्त = प्रकट हो जाती हैं। इस विषय को आगे स्पष्ट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि चाहे वे वासनायें वर्त्तमान जन्म से सैंकड़ों जन्म पूर्व बनी हों, अर्थात् पूर्व में प्राप्त मनुष्य योनि और वर्त्तमान में प्राप्त मनुष्य योनि के मध्य सैंकड़ों अन्य योनियाँ भी कर्मानुसार प्राप्त क्यों न हुई हों, तब भी वे वासनायें अभिव्यक्त हो जाती हैं; इसी प्रकार चाहे वे वासनायें किसी अन्य देश = लोक आदि में ही क्यों न बनी हों अर्थात् वर्त्तमान मनुष्य जन्म जिस लोक या स्थान पर हुआ जैसे कि इस पृथिवी के स्थान विशेष पर, और पूर्व का मनुष्य जन्म किसी अन्य लोक अथवा इसी पृथिवी के किसी अन्य स्थान पर हुआ हो, तो भी वे वासनायें अभिव्यक्त हो जाती हैं; और इसी प्रकार चाहे उन दो समान प्रकार के शरीरों में कितने भी काल का अन्तराल क्यों न हो, इस पर महर्षि व्यास लिखते हैं - “कल्पशतेन वा व्यवहितः” अर्थात् सैंकड़ों कल्पों के पश्चात् ही वह शरीर क्यों न मिला हो, तो भी वे वासनायें अभिव्यक्त हो जाती हैं।

इस व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि जाति-आयु-भोग रूपी फल प्रदान करने वाला पुण्य-पाप कर्माशय अपने निमित्त के उपस्थित होने पर अभिव्यक्त होता है। वह पाप-पुण्य कर्माशय जाति के व्यवधान की, देश = स्थान के व्यवधान की अथवा काल के व्यवधान की सीमा से रहित होता हुआ, जब भी अपने अभिव्यक्त करने वाले निमित्त = कारणों को प्राप्त करता है, तो पूर्वानुभूत वासनाओं को लेकर अभिव्यक्त हो जाता है। इसमें कारण यह है कि समान प्रकार का कर्म ही, इन वासनाओं को अभिव्यक्त करने वाला निमित्त = कारण होता है। अतः वासनाओं की अभिव्यक्ति में जाति, देश अथवा काल की दूरी किसी प्रकार से व्यवधान नहीं बनती; और वर्त्तमान शरीर में, पुरुष के चित्त में, पूर्व काल में प्राप्त समान शरीर में संचित वासनायें अभिव्यक्त = प्रकट हो जाती हैं। ऐसा क्यों होता है ? इस का उत्तर देते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं — “स्मृतिसंस्कारयोः एकरूपत्वात्” = स्मृति और संस्कारों का एकरूप वाला होने से।

जीवात्मा को, अपने कर्माशय के फल, जाति-आयु-भोग, की प्राप्ति में सुख-दुःख के जैसे अनुभव होते हैं, उसी प्रकार के संस्कार उसके चित्त में बनते हैं। अर्थात् ये संस्कार कर्मों की वासना के अनुसार ही होते हैं। और फिर जिस प्रकार की वासनायें होती हैं, वैसी ही स्मृति भी होती है। अर्थात् कर्मों की वासना के अनुरूप ही संस्कार और उसी प्रकार की स्मृति भी होती है; अतः संस्कार और स्मृति का कारण एक प्रकार की वासनायें होने से ही दोनों की एकरूपता कही गई है। इसलिए जाति, देश अथवा काल का व्यवधान होने पर भी कर्म वासनाओं के अनुकूल संस्कारों से स्मृति उत्पन्न होती है; इस उत्पन्न हुई स्मृति से पुनः संस्कार उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार से ही संस्कार-स्मृति-संस्कार का चक्र चलता रहता है। ये दोनों ही, संस्कार और स्मृति, पुरुष के चित्त में, ईश्वरीय व्यवस्था में, कर्माशय के फलोन्मुख होने से प्रकट हो जाते हैं। इनमें जाति, देश, काल का व्यवधान होते हुए भी, जाति विशेष की प्राप्ति होने पर, इनकी निरन्तरता ही बनी रहती है।

काल व्यवधान होने पर वासनाओं की निरन्तरता के बने रहने का सबसे प्रबल उदाहरण मुक्ति से पुनरावृत्ति पर जाना जाता है। मुक्ति के ३६००० छत्तीस हजार कल्प पर्यन्त का काल व्यतीत होने पर जीवात्मा को जब साधारण मनुष्य का जन्म मिलता है, तो उस समय उस पुरुष के चित्त में, मुक्ति से पूर्व प्राप्त मनुष्य शरीर में संचित हुई वासनायें प्रकट होती हैं। तथा उस जीवन में संचित कर्माशय के फलानुसार जब दूसरी योनियों में जाता है, तो उस-उस योनि के अनुकूल वासनायें प्रकट होती हैं। मुक्ति के उपरान्त जिस-जिस योनि की प्राप्ति पहली बार होती है, उस-उस योनि में, पहले की वैसी वासनाओं का प्रकट होना ही सिद्ध करता है कि उस पुरुष = आत्मा के मुक्ति पूर्व की विभिन्न योनियों की वासनायें, तथा उन वासनाओं के वैसे ही संस्कार और स्मृतियाँ उसके चित्त में उपस्थित हैं। अतः मुक्ति के काल का व्यवधान भी उन वासनाओं की निरन्तरता = समीपता को नष्ट नहीं करता।

भोज ने संस्कार-स्मृति-संस्कार चक्र को थोड़ा और स्पष्ट किया है — संस्कारों से स्मृति, स्मृति से सुख-दुःख का उपभोग, उस सुख-दुःख के अनुभव से फिर से संस्कार की उत्पत्ति होती है, और इस प्रकार जीवात्मा कर्माशय के जटिल जाल में जकड़ा रहता है।

पूर्व सूत्र की व्याख्या में हमने कुत्ते और कछुए के नवजात बच्चे का उदाहरण दिया था। अब यदि किसी जीवात्मा को वर्त्तमान काल में कुत्ते का शरीर मिला है, तो चाहे उसे पिछली बार कुत्ते का शरीर एक हजार विभिन्न शरीरों से पहले मिला हो, चाहे उसे वह कुत्ते का शरीर दूसरे किसी लोक में मिला हो, चाहे बहुत काल = सहस्रों वर्षों / कल्पों पूर्व मिला हो, तो भी उस पूर्व में प्राप्त हुए कुत्ते के शरीर में जाति-आयु-भोग के अनुकूल जैसे संस्कार बने थे, वही संस्कार और उनकी स्मृति अब वर्त्तमान काल में अभिव्यक्त हो जायेगी। और वह जीवात्मा उस कुत्ते की देह में होने वाले कर्मों को उसी प्रकार से करेगा जैसे कि अभी पिछले जन्म में ही कर के हटा हो, अर्थात् उसका भौंकना, कच्चे मांसादि का भक्षण, स्वामिभक्ति, हड्डी चूसना, अन्य बलवान् परभक्षी जीवों से अपनी रक्षा हेतु प्रयत्न आदि कार्य पूर्व के समान बिना किसी प्रशिक्षण के होते रहेंगे। इसी प्रकार समुद्र किनारे उत्पन्न हुए कछुए के नवजात बालक की, परभक्षियों से प्राण रक्षा हेतु समुद्र की ओर दौड़ लगाने के विषय में भी समझा जा सकता है।

परन्तु मानव शरीर की प्राप्ति होने पर एक विशेष अन्तर आता है। और वह है, मानव शरीर का कर्म एवं भोग योनि होना, जबकि पशु-पक्षी आदि इतर योनियाँ भोग योनियाँ कहलाती हैं। भोग योनियों में तदनुकूल वासनाओं के आधार पर ही उस प्राणी का जीवन चलता है; जबकि कर्म योनि में जीवात्मा को कर्म करने की स्वतन्त्रता रहती है। अर्थात् मानव शरीर में उन पूर्व काल के मानव शरीरों में संचित कर्माशय के अनुकूल वासनाओं के प्रकट होने पर भी, जीवात्मा के लिए, जीवन को उन्नत बनाने हेतु, बुद्धि रूपी महत्त्वपूर्ण करण की उपस्थिति रहती है, और ज्ञान प्राप्ति का अवसर रहता है। और इस प्रकार से वह जीवात्मा, मनुष्य शरीर में अपने पिछले संस्कारों से विपरीत, उन्नति अथवा अवनति को भी प्राप्त कर सकता है, अथवा फिर सामान्य जीवन जीते हुए अपने क्लिष्ट कर्माशय को सुदृढ़ करते हुए संसार-चक्र में अधिक दृढ़ता से बंध सकता है। उन्नति और अवनति हेतु महर्षि व्यास ने नन्दीश्वर और नुहुष के उदाहरण दिए हैं। इनकी व्याख्या यथास्थान उन-उन सूत्रों में कर दी गयी है।