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तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्॥१०॥

In Hindi:

पदपाठ : तासाम् अनादित्वम् च अशिषः नित्यत्वात्॥

हिंदी में अर्थ : (तासाम्) उन वासनाओं का (अनादित्वम् च) अनादित्व = अनादि होना भी सिद्ध होता है, (आशिषः) कामना = इच्छा के (नित्यत्वात्) नित्य होने से। अर्थात् जीवन की कामना = इच्छा के नित्य होने से = सदा बने रहने से, वासनाओं का अनादि होना सिद्ध होता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : तासां वासनानामाशिषो नित्यत्वादनादित्वम्। येयमात्माशीर्मा न भूवं भूयासमिति सर्वस्य दृश्यते सा न स्वाभाविकी। कस्मात्? जातमात्रस्य जन्तोरननुभूतमरणधर्मकस्य द्वेषदुःखानुस्मृतिनिमित्तो मरणत्रासः कथं भवेत्? न च स्वाभाविकं वस्तु निमित्तमुपादत्ते। तस्मादनादिवासनानुविद्धमिदं चित्तं निमित्तवशात्काश्चिदेव वासनाः प्रतिलभ्य पुरुषस्य भोगायोपावर्त्तत इति।

घटप्रासादप्रदीपकल्पं संकोचविकासि चित्तं शरीरपरिमाणाकारमात्रमित्यपरे प्रतिपन्नाः। तथा चान्तराभावः संसारश्च युक्त इति। वृत्तिरेवास्य विभुनश्चित्तस्य संकोचविकासिनीत्याचार्यः। तच्च धर्मादिनिमित्तापेक्षम्। निमित्तं च द्विविधम्—बाह्यमाध्यात्मिकं च। शरीरादिसाधनापेक्षं बाह्यं स्तुतिदानाभिवादनादि। चित्तमात्राधीनं श्रद्धाद्याध्यात्मिकम्। तथाचोक्तम्—ये चैते मैत्र्यादयो ध्यायिनां विहारास्ते बाह्यसाधननिरनुग्रहात्मानः प्रकृष्टं धर्ममभिनिर्वर्तयन्ति। तयोर्मानसं बलीयः। कथम्। ज्ञानवैराग्ये केनातिशय्येते। दण्डकारण्यं चित्तबलव्यतिरेकेण शारीरेण कर्मणा शून्यं कः कर्त्तुमुत्सहेत समुद्रमगस्त्यवद्वा पिबेत्॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (आशिषः) इच्छा = कामना के (नित्यत्वात्) नित्य होने से (तासाम्) उन (वासनानाम्) वासनाओं का (अनादित्वम्) अनादि होना सिद्ध होता है। (या) जो (इयम्) यह (आत्माशीः) आत्मविषयक कामना है कि (मा न भूवम् भूयासम् इति) “मैं न होऊँ, ऐसा न हो” अर्थात् “मैं सर्वदा बना रहूँ” यह कामना = इच्छा (सर्वस्य दृश्यते) सभी प्राणियों में देखी जाती है; (सा) वह आत्मविषयक कामना (स्वाभाविकी न) स्वाभाविक = बिना किसी कारण के नहीं है। (कस्मात्) ऐसा क्यों है ? क्योंकि (जातमात्रस्य जन्तोः) तत्काल = उसी समय उत्पन्न प्राणी, जिसने (अननुभूतमरणधर्मकस्य) वर्त्तमान जन्म में मरण धर्म का अनुभव नहीं किया है, को (द्वेषः दुःखानुस्मृतिनिमित्तः मरणत्रासः) द्वेषात्मक, दुःख की स्मृति के निमित्त = से उत्पन्न होने वाला मरणभय (कथम् भवेत्) कैसे हो सकता है ? (च) और (स्वाभाविकम् वस्तु) स्वाभाविक वस्तु (निमित्तम् न उपादत्ते) निमित्त = कारण का आश्रय नहीं लेती। (तस्मात्) इसलिये (अनादिवासनानुविद्धम्) अनादि वासनाओं से अनुविद्ध = सम्बद्ध = युक्त (इदम्) यह (चित्तम्) चित्त (निमित्तवशात्) निमित्त के वश से (काश्चित् एव) कुछ ही = किन्हीं (वासनाः) वासनाओं को (प्रतिलभ्य) लेकर = अभिव्यक्त कर (पुरुषस्य) पुरुष के (भोगाय) भोग के लिए (उपावर्त्तते इति) प्रवृत्त होता है।

(घटप्रासादप्रदीपकल्पम्) घट और प्रासाद में रखे दीपक के समान (संकोचविकासि) संकोच और विकास धर्म वाला (चित्तम्) चित्त (शरीरपरिमाणाकारमात्रम्) शरीर के परिणाम के आकार मात्र वाला है, (इति अपरे प्रतिपन्नाः) ऐसा दूसरे आचार्य मानते हैं। (तथा च) और वैसा मानने से ही (अन्तराभावः) (एक देह त्याग और दूसरी देह प्राप्ति में) बाधा = विघ्न का अभाव रहता है, (च) और (संसारः) संसारचक्र = जन्म-मृत्यु चक्र भी (युक्तः इति) सिद्ध होता है। इस विषय में शास्त्र के आचार्य पतञ्जलि का मत कहते हैं — (अस्य) इस (विभुनः चित्तस्य) विभु = समस्त करणों = इन्द्रियों में विशिष्ट चित्त अथवा सभी इन्द्रियों से सम्बन्ध रखने वाले चित्त की (वृत्तिः एव) वृत्ति ही (संकोचविकासिनि) संकोच और विकास धर्म वाली होती है, (इति आचार्यः) यह महर्षि पतञ्जलि मानते हैं।

(च) और (तत्) वह चित्त (वृत्ति के संकोच एवं विकास में) (धर्मादिनिमित्तापेक्षम्) धर्म-अधर्म रूप निमित्तों = कारणों की अपेक्षा रखता है। (च) और (निमित्तम्) धर्माधर्म निमित्त (द्विविधम्) दो प्रकार का है — (बाह्यम्) बाह्य (च) और (आध्यात्मिकम्) आध्यात्मिक। (शरीरादिसाधनापेक्षम्) शरीर, इन्द्रिय आदि साधनों की अपेक्षा रखने वाले (स्तुतिदानाभिवादनादि) स्तुति, दान, अभिवादन आदि निमित्त (बाह्यम्) बाह्य हैं, और (चित्तमात्राधीनम्) केवल मात्र चित्त के अधीन = चित्त से होने वाले (श्रद्धादिः) श्रद्धा आदि निमित्त (आध्यात्मिकम्) आध्यात्मिक हैं। (तथा च उक्तम्) और वैसा कहा है — (च ये एते) और ये जो (ध्यायिनाम्) ध्यान करने वाले योगियों के (मैत्र्यादयः) मैत्री, करुणा आदि (विहाराः) चित्त के व्यापार हैं, (ते) वे (बाह्यसाधननिरनुग्रहात्मानः) बाह्य शरीर आदि साधनों की अपेक्षा न करते हुए (प्रकृष्टम् धर्मम्) उत्कृष्ट धर्म को (अभिनिर्वर्तयन्ति) उत्पन्न करते हैं।

(तयोः) उन बाह्य और आध्यात्मिक निमित्तों में से (मानसम्) चित्त से सम्पादित होने वाले आध्यात्मिक निमित्त (बलीयः) बलवान् होता है। (कथम्) किस प्रकार से ? क्योंकि (ज्ञानवैराग्ये) ज्ञान और वैराग्य (केन) किस बाह्य निमित्त द्वारा (अतिशय्येते) अभिभूत किये जा सकते हैं ? अर्थात् ज्ञान और वैराग्य से बढ़कर कोई निमित्त प्रभावशाली नहीं होता। इसमें उदाहरण देते हैं — (दण्डकारण्यम् च) दण्डकारण्य को (चित्तबलव्यतिरेकेण) चित्त बल के बिना (शारीरेण कर्मणा) केवल शारीरिक कर्म से (शून्यम् कर्त्तुम्) निर्जन करने का (कः) कौन (उत्सहेत) साहस कर सकता है ? (वा) और (अगस्त्यवत्) अगस्त्य ऋषि के समान (समुद्रम्) समुद्र का (कः) कौन (पिबेत्) पान कर सकता है?

वैदिक वृत्ति : जीवात्मा को समान जाति की प्राप्ति होने पर जाति, देश एवं काल के व्यवधान वाली वासनायें उसी प्रकार से अभिव्यक्त हो जाती हैं, जैसे कि ये अभी पूर्व जन्म में ही बनी हों। भोज इस सूत्र की अवतरणिका में शंका उठाते हैं कि “जब पुरुष = जीवात्मा को पहला ही अनुभव होता है, तब वह अनुभव वासनाओं के निमित्त से होता है अथवा बिना किसी निमित्त के होता है ?” और यदि पहले अनुभव हेतु, पूर्व में अनुभूत और तदनुकूल वासनाओं के न होने से, वासनाओं की निमित्तता नहीं होती तो प्रथम अनुभव के पश्चात् होने वाले अनुभवों हेतु भी इनकी आवश्यकता क्यों मानी जाये? यह स्थिति सर्ग के आरम्भ में, प्रत्येक योनि विशेष में, पहली बार शरीर धारण करने पर उत्पन्न होती है।

इस विषय में महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि पुरुष = आत्मा की कामना = इच्छा के नित्य होने से वासनाओं का अनादि होना सिद्ध होता है। इच्छा गुण चेतन जीवात्मा का है; और जीवात्मा की, अपने कल्याण की, इच्छा सदा रहती है, इसी कारण कर्माशय और उस कर्माशय से बनी वासनायें भी अनादि सिद्ध होती हैं। वस्तुतः सर्ग के आरम्भ में पहली बार किसी योनिविशेष में जन्म होने पर भी, वासनाओं की अभिव्यक्ति, पूर्व सर्गों में हुए जन्मों में बनी वासनाओं को सिद्ध करती है। महर्षिव्यास कहते हैं कि यह जो आत्मविषयक कामना है कि “मैं न होऊँ, ऐसा न हो”, सभी प्राणियों में समान रूप से पायी जाती हैै। अर्थात् आत्मा द्वारा किसी भी शरीर को धारण करने के पश्चात् उस शरीरविशेष में बने रहने की = मृत्यु से बचने की इच्छा होती है, और यह इच्छा स्वाभाविक नहीं होती। क्योंकि जो प्राणी तत्काल उत्पन्न हुआ है, उसने यदि मरणभय को पूर्व में अनुभव नहीं किया हो तो, उस प्राणी को मरणभय नहीं होना चाहिए। मरण की अनुभूति के बिना, मरण रूप दुःख की स्मृति और उस दुःख के प्रति द्वेष रूप निमित्त से, होने वाला मरणभय उस प्राणी को कैसे हो सके ? इससे पूर्व सूत्र में दिए नवजात कछुए के बालकों का उदाहरण इस स्थिति को स्पष्ट करता है। क्योंकि मरणभय किसी कारण = निमित्त के आश्रय ही होता है स्वतः नहीं, अतः इस मरणभय को स्वाभाविक नहीं माना जा सकता। यदि मरणभय स्वाभाविक हो तो सभी काल में अभिव्यक्त होना चाहिए, न कि मरण के किसी निमित्त = कारण के उपस्थित होने पर। अतः जिस प्रकार उस नवजात कछुए को पूर्व कछुए के शरीर में मरण दुःख हुआ था, उस वासना की उसके चित्त में अभिव्यक्ति ही, समुद्र के किनारे अण्डे से निकलते ही, वहाँ परभक्षी प्राणियों की उपस्थिति रूप मरणभय की आशंका, उसे तत्काल समुद्र की ओर दौडने हेतु बाध्य करती है; वही कछुए का बालक जब समुद्र में पहुँच जाता है, तो स्थल पर उपस्थित परभक्षियों के निमित्त से उत्पन्न हुआ उसका मरणभय समाप्त हो जाता है, और वह समुद्र की लहरों के साथ तैरने लगता है। अब उसका मरणभय कम होकर मात्र उन्हीं परभक्षी प्राणियों के प्रति रह जाता है, जो समुद्र के अन्दर उसे मारने में समर्थ हो सकते हैं। अतः निमित्त परिवर्तन से मरणभय का स्तर बदलता रहता है, और निमित्त के न होने पर मरणभय भी नहीं रहता। इसी से वासनाओं का प्रवाह से अनादि होना सिद्ध होता है।

अतः अनादि वासनाओं से युक्त चित्त, शरीर विशेष की प्राप्ति होने पर, उस-उस शरीर सम्बन्धी वासनाओं को अभिव्यक्त कर पुरुष = आत्मा के लिये भोग का सम्पादन करता है। इसमें यह जानना चाहिए कि इसप्रकार से चित्त में, उस-उस शरीर सम्बन्धी वासनाओं की अभिव्यक्ति, ईश्वरीय कर्मफल व्यवस्था में ही होती है; क्योंकि चित्त, प्रकृति का विकार होने से, जड़ है; और जड़ में ऐसे किसी सामर्थ्य का अभाव है।

जिस चित्त के आश्रय, ये प्रवाह से अनादि वासनायें अभिव्यक्त होकर पुरुष को भोग हेतु प्रवृत्त करती हैं, वह चित्त कैसा है तथा किस प्रकार से कार्य करता है ? इस विषय में कुछ आचार्यों का मत है कि चित्त संकोच और विकास शील है। जैसे कि दीपक का प्रकाश घट में संकुचित और प्रासाद में विकसित हो जाता है, उसी प्रकार शरीर विशेष के अनुसार चित्त भी संकोच और विकास को प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह शरीर के परिणाम को प्राप्त हो जाता है, यथा मच्छर के शरीर में छोटा और हाथी के शरीर में बड़ा हो जाता है। इस प्रकार से चित्त की विभिन्न शरीरों में गति हेतु कोई बाधा नहीं होती और संसारचक्र चलता रहता है। भोज ने भी अपने भाष्य में चित्त को इसी प्रकार का संकोच और विकास वाला माना है। इस मान्यता में यह दोष आता है कि शरीर के परिणाम को प्राप्त होने पर चित्त का सम्बन्ध सभी ज्ञानेन्द्रियों से एक साथ सम्बन्ध रहेगा, तो ऐसे में एक काल में एक से अधिक ज्ञान उत्पन्न होने चाहिए, जोकि प्रत्यक्ष विरुद्ध है। अतः चित्त को शरीर के आकार वाला मानना युक्तियुक्त नहीं है।

दूसरी ओर महर्षिव्यास ने महर्षि पतञ्जलि के मत में चित्त को विभु कहा है और उस विभु चित्त की वृत्ति ही संकोच और विकास वाली होती है। यहाँ “विभु” का अर्थ पौराणिक भाष्यकारों ने व्यापक किया है। परन्तु यहाँ विभु का अर्थ व्यापक न होकर, वि पूर्वक भू धातु के अनुसार विशिष्ट धर्म वाला है। अतः चित्त शरीर में अन्य ज्ञानेन्द्रियों की अपेक्षा से विशिष्ट धर्म वाला तथा सभी इन्द्रियों से सम्बन्ध बनाने वाला तथा इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त हुए विषयों को पुरुष तक पहुँचाने वाला है। इन्हीं विशेषताओं के कारण ही इसे विभु = विशिष्ट कहा गया है। अगर विभु का अर्थ व्यापक किया जाये तो यह महर्षि पतञ्जलि की अन्तःसाक्षी और अन्य शास्त्रों के प्रमाणों से विरुद्ध होगा, यथा —

१. बन्धकारणशैथिल्यात् प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः॥ योग० ३.३८॥

इस सिद्धि में महर्षि पतञ्जलि ने चित्त का शरीर में गति के मार्गों के ज्ञान से दूसरे शरीर में प्रवेश माना है। यदि चित्त को व्यापक माना जाये तो चित्त की शरीर में गति तथा उसका एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश कैसे सम्भव होगा ?

२. हृदये चित्तसंवित्॥ योग० ३.३४॥

इस सूत्र की व्याख्या में चित्त का स्थान वेद और ब्राह्मणग्रन्थों के प्रमाणों से मन = चित्त का स्थान हृदय सिद्ध किया है। अतः एक देश में रहने वाला चित्त व्यापक कैसे हो सकता है ?

३. तदभावादणुः मनः॥ वैशेषिक ७.१.२५॥

यहाँ आकाश के विपरीत मन को अणु परिणाम वाला कहा है।

४. महर्षि गौतम मन को अणु = अविभु कहते हैं —

क्रमवृत्तित्वादयुगपद्ग्रहणम्॥ न्याय० ३.२.६॥

इस सूत्र की भूमिका में वात्स्यायन भाष्य इस प्रकार से कहते है — अविभु चैकं मनः पर्यायणेन्द्रियैः संयुज्यत इति अर्थात् मन का संयोग इन्द्रियों से एक साथ न होकर पर्याय से होता है, अतः मन अविभु = अणु है। यदि मन विभु हो तो एक साथ बहुत ज्ञान होने चाहिए। परन्तु यह प्रत्यक्ष विरुद्ध है।

५. अणुपरिणामं तत्कृति श्रुतेः॥ सांख्य० ३.१४॥

मन की उत्पत्ति शब्द प्रमाण से सिद्ध है तथा वह मन अणु परिणाम वाला है। और

न व्यापकत्वं मनसः करणत्वादिन्द्रियमत्वाद्वा आस्यादिवच्चक्षुरादिवत्॥ सांख्य० ५.६९॥

अर्थात् कोई भी करण अथवा इन्द्रिय चक्षु आदि के समान एकदेशी ही हो सकता है, व्यापक नहीं, अतः मन की व्यापकता सम्भव नहीं है। और फिर

सक्रियत्वाद् गतिश्रुतेः॥ सांख्य० ५.७०॥

वेदादि सत्यशास्त्रों में मन की गति का वर्णन है। अतः मन व्यापक नहीं हो सकता।

यदि चित्त को शरीर में व्यापक कहा जाये तो यह मान्यता दूसरे आचार्यों की मान्यता के समान हुई, जिससे भिन्न महर्षि व्यास सूत्रकार की मान्यता को प्रतिपादित कर रहे हैं। अतः योगदर्शन की अन्तःसाक्षी और अन्य शास्त्रों के प्रमाणानुकूल मन = चित्त अणु परिणाम वाला सिद्ध होता है। ऐसे में महर्षि पतञ्जलि और महर्षिव्यास द्वारा मन को व्यापक नहीं कहा जा सकता, अतः इस सन्दर्भ में विभु का अर्थ “विशिष्ट गुण वाला” ही युक्त है।

इस अणु चित्त की वृत्ति संकोच और विकास वाली होती है। चित्त की वृत्तियों का संकोच अथवा विकास धर्म-अधर्म रूप निमित्तों = कारणों पर निर्भर करता है। शरीर और इन्द्रिय आदि साधनों की अपेक्षा रखने वाले स्तुति, दान, अभिवादन आदि धर्म बाह्य निमित्त कहाते हैं। इसी प्रकार शरीर और इन्द्रियों के सहयोग से होने वाले अधर्मों को भी बाह्य निमित्त वाला जानना चाहिए। दूसरी ओर, मात्र चित्त से होने वाले धर्म-अधर्म आध्यात्मिक निमित्त कहाते हैं। योगी द्वारा चित्त के आश्रय से सम्पादन होने वाले मैत्री, करुणा आदि व्यापार, बाह्य शरीर और इन्द्रियों की अपेक्षा से रहित होते हुए, उत्कृष्ट धर्म को उत्पन्न करते हैं। इस सन्दर्भ में महर्षिव्यास ने योगसूत्र ४.७ के भाष्य में तप, स्वाध्याय और ध्यान को पूर्णतया शुभ कर्मों की श्रेणी में रखा है, जो कि इन कर्मों की उत्कृष्टता को प्रातिपादित करता है। इसी प्रकार चित्त द्वारा सम्पादन किए जाने वाले अधर्म, अविद्या, अवैराग्य = विषय चिन्तन आदि आन्तरिक निमित्त, पुरुष को अज्ञानान्धकार में ढकेलते हैं।

अतः महर्षिव्यास कहते हैं कि इन बाह्य और आध्यात्मिक निमित्तों में से, चित्त से सम्पादित होने वाले आध्यात्मिक निमित्त अधिक बलवान् होते हैं। इनके बलवान् होने में कारण यह है कि चित्त में उत्पन्न हुए ज्ञान और वैराग्य की स्थिति को बाह्य निमित्तों = कारणों से दबाया नहीं जा सकता। बाह्य निमित्त कुछ काल के लिए चित्त में विक्षेप तो उत्पन्न कर सकते हैं, परन्तु ज्ञान और वैराग्य को सर्वथा अभिभूत नहीं कर सकते। इसमें उदाहरण देते हुए कहा है कि चित्त बल के बिना, मात्र शारीरिक बल से कौन व्यक्ति दण्डकारण्य को शून्य कर सकता है? अथवा अगस्त्य ऋषि के समान कौन समुद्र का पान कर सकता है? यहाँ इन दोनों उदाहरणों में चित्तबल के महत्त्व को दर्शाया है। श्री रामचन्द्र द्वारा, चित्त-बल की प्रधानता के साथ, शारीरिक बल से दण्डकारण्य में उपस्थित खरदूषण आदि असुरों, जो केवल मात्र शारीरिक बल से युक्त थे, का नाश करना, शारीरिक बल की अपेक्षा से चित्त बल के महत्त्व को दर्शाता है। इसी प्रकार दूसरे उदाहरण में अगस्त्य ऋषि द्वारा समुद्र पान को कहा है। वस्तुतः इस उदाहरण में लौकिक भूमिस्थ समुद्र का वर्णन नहीं है, जो कि बाद में महर्षिव्यास के नाम से पुराणों में कहा गया है। पुराणों में तो इस कथानक के वास्तविक रहस्य को ही छिपा दिया है, जिससे प्रक्षिप्त इतिहास प्रचलित हो गया है। वस्तुतः शतपथ ब्राह्मण में मन को समुद्र कहा है —

मनो वै समुद्रः॥ शतपथ ७.५.२.५२॥

अतः मन रूपी समुद्र में वृत्तियों रूपी जल को, अगस्त्य ऋषि ने शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म और शुद्ध उपासना रूप तीन साधनों से, पान कर लिया, और ऐसा चित्त कृतकत्य हुआ आत्मा के समान पवित्र होकर स्थित हुआ। इस प्रकार यह कार्य भी, शारीरिक बल से सम्भव न होकर, चित्तबल से ही सम्भव है। अतः आन्तरिक साधना हेतु आध्यात्मिक निमित्त ही प्रधान कहे गये हैं।

साधक को यह भी जानना चाहिए कि शरीर, वाणी और मन द्वारा होने वाले कर्मों में से सबसे अधिक कर्म मानसिक ही होते हैं। किसी भी कर्म का आरम्भ मन से होकर ही, वाणी अथवा शरीर अथवा दोनों साधनों द्वारा उसका सम्पादन सम्भव है। यदि साधक मानसिक कर्मों पर नियन्त्रण कर ले, तो वह चित्तवृत्ति निरोध की अवस्था को प्राप्त कर सकता है। अतः इस कारण भी बाह्य निमित्तों की अपेक्षा से आध्यात्मिक निमित्त अधिक बलवान् कहे गये हैं। साधक द्वारा इस रहस्य को जानकर, अपनी चित्तवृत्तियों में से अधर्म-अज्ञान-अवैराग्य रूप वृत्तियों का संकोच तथा धर्म-ज्ञान-वैराग्य रूप वृत्तियों का विकास करना चाहिए।