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हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः॥११॥

In Hindi:

पदपाठ : हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वात् एषाम् अभावे तद् अभावः॥

हिंदी में अर्थ : (हेतुफलाश्रयालम्बनैः) हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन रूप चार कारणों से (संगृहीतत्वात्) वासनाओं का संग्रह होने से (एषाम्) इन हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन का (अभावे) अभाव हो जाने पर (तद्-अभावः) उन वासनाओं का अभाव हो जाता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : हेतुर्धर्मात्सुखमधर्मात् दुःखं सुखाद्रागो दुःखात् द्वेषस्ततश्च प्रयत्नस्तेन मनसा वाचा कायेन वा परिस्पन्दमानः परमनुगृह्णात्युपहन्ति वा। ततः पुनर्धर्माधर्मौ सुखदुःखे रागद्वेषाविति प्रवृत्तमिदं षडरं संसारचक्रम्। अस्य च प्रतिक्षणमावर्त्तमानस्याविद्या नेत्री मूलं सर्वक्लेशानामित्येष हेतुः। फलं तु यमाश्रित्य यस्य प्रत्युपन्नता धर्मादेः। न ह्यपूर्वोपजनः। मनस्तु साधिकारमाश्रयो वासनानाम्। न ह्यवसिताधिकारे मनसि निराश्रया वासनाः स्थातुमुत्सहन्ते। यदभिमुखीभूतं वस्तु यां वासनां व्यनक्ति तस्यास्तदालम्बनम्। एवं हेतुफलाश्रयालम्बनैरेतैः संगृहीताः सर्वा वासनाः। एषामभावे तत्संश्रयाणामपि वासनानामभावः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (हेतुः) हेतु अर्थात् वासना का प्रथम कारण इस प्रकार है कि पुरुष को (धर्मात्) धर्म से (सुखम्) सुख, और (अधर्मात्) अधर्म से (दुःखम्) दुःख होता है। (सुखात्) सुख भोग से (रागः) चित्त में सुख और सुख-साधनों के प्रति राग, और (दुःखात्) दुःख से (द्वेषः) दुःख और दुःख-साधनों के प्रति द्वेष होता है। (ततः च) और उन राग-द्वेष से (प्रयत्नः) प्रयत्न होता है। (तेन) उस प्रयत्न के कारण मनुष्य (मनसा वाचा कायेन वा) मन, वाणी तथा शरीर से (परिस्पन्दमानः) चेष्टा करता हुआ (परम्) अन्य प्राणियों = जीवों पर (अनुगृह्णाति) अनुग्रह = परोपकार = दया करता है, (वा) अथवा (उपहन्ति) उनको पीडि़त करता, उनकी हानि करता है। (ततः) दूसरे प्राणियों पर अनुग्रह अथवा हिंसा आदि से (पुनः) फिर (धर्माधर्मौ) धर्म-अधर्म का संग्रह होता है, उससे (सुखदुःखे) सुख-दुःख और उससे (रागद्वेषौ) राग-द्वेष होते हैं। (इति) इस प्रकार अनादि काल से (इदम्) यह (षडरम्) छह अरों वाला (संसारचक्रम्) संसारचक्र (प्रवृत्तम्) प्रवृत्त हो रहा है। (च) और (अस्य) इस (प्रतिक्षणम्) प्रतिक्षण (आवर्त्तमानस्य) घूमने वाले संसारचक्र को (नेत्री) चलाने वाली (अविद्या) अविद्या है, जो (सर्वक्लेशानाम्) सभी क्लेशों का (मूलम्) मूल कारण है; (इति) इसलिये (एषः) यह अविद्या ही वासनाओं का (हेतुः) हेतु = कारण है।

(फलम् तु) फल तो वह है (यम) जिसको (आश्रित्य) आश्रय = लक्ष्य बना कर (यस्य) जिस (धर्मादेः) धर्म आदि की (प्रत्युपन्नता) वर्त्तमानता = उत्पत्ति होती है; (हि) क्योंकि (अपूर्वोपजनः न) पहले से रहने वाले पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती।

(साधिकारम् मनः तु) साधिकार = अधिकार सहित मन (वासनानाम्) वासनाओं का (आश्रयः) आश्रय है। (हि) क्योंकि (अवसिताधिकारे मनसि) समाप्ताधिकार मन = कृतकृत्य चित्त में (निराश्रयाः वासनाः) आश्रय हीन वासनायें (स्थातुम् न उत्सहन्ते) स्थित नहीं हो सकती।

(यद् वस्तु) जो वस्तु (अभिमुखीभूतम्) सम्मुख होकर (याम्) जिस (वासनाम्) वासना को (व्यनक्ति) अभिव्यक्त = प्रकट करती है, (तस्याः) उस वासना का (तत्) वह (आलम्बनम्) आलम्बन है।

(एवम्) इस प्रकार (एतैः हेतुफलाश्रयालम्बनैः) इन हेतु, फल, आश्रय और आलम्बनों से (सर्वाः वासनाः) सभी वासनायें (संगृहीताः) संगृहीत होती हैं। (एषाम्) इन हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन रूप कारणों के (अभावे) अभाव होने पर (तत् संश्रयाणाम्) उन निमित्तों के कारण होने वाली (वासनानाम्) वासनाओं का (अपि) भी (अभावः) अभाव हो जाता है॥

वैदिक वृत्ति : प्रत्येक जन्म में प्राप्त शरीर के अनुसार चित्त में अभिव्यक्त होने वाली वासनाओं को पूर्व सूत्र में प्रवाह से अनादि सिद्ध किया गया है। चित्त जब तक इन वासनाओं के जाल से युक्त रहता है, तब तक पुरुष के लिये भोग का सम्पादन करने हेतु ईश्वरीय कर्मफल व्यवस्था में लगा रहता है। ऐसे में इस साधिकार चित्त के रहते हुए पुरुष के लिए कैवल्य की प्राप्ति सम्भव नहीं है। अतः इन अनादि वासनाओं की निवृत्ति का उपाय होना चाहिए अन्यथा जन्म-मरण रूपी संसारचक्र की निवृत्ति सम्भव नहीं होगी।

महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि ये वासनायें सनिमित्तक हैं, अतः इन वासनाओं के निमित्तों का अभाव हो जाने पर वासनाओं का भी अभाव हो जायेगा। यही एकमात्र उपाय इन अनादि वासनाओं की निवृत्ति का है। पुरुष के चित्त में ये वासनायें हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन रूप निमित्तों = कारणों से संगृहीत होती हैं।

१. हेतु :— महर्षिव्यास कहते हैं कि पुरुष को धर्माचरण से सुख की और अधर्माचरण से दुःख की प्राप्ति होती है। सुख प्राप्त होने पर पुरुष के चित्त में सुख और सुख प्राप्ति के साधनों के प्रति राग होता है, अर्थात् वह उनको पुनः प्राप्त करना चाहता है; और दुःख प्राप्त होने पर उसके चित्त में दुःख और दुःख-साधनों के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है, अतः उसका यह प्रयास होता है कि वे पुनः प्राप्त न हों। इस राग-द्वेष के कारण प्रयत्न होता है। अतः व्यक्ति मन, वाणी और शरीर के द्वारा, दूसरे प्राणियों पर या तो अनुग्रह करता है अथवा उनको पीडि़त आदि करता है। अर्थात् मनुष्य सुख एवं सुख-साधनों में राग के कारण, उन सुख-साधनों की प्राप्ति में अनुकूल, दूसरे प्राणियों पर अनुग्रह करता है, और उन सुख-साधनों में प्रतिकूल, दूसरे प्राणियों को पीडि़त करता या उनको हानि पहुँचा कर भी अपने सुख-साधनों को सुरक्षित रखना चाहता है। इसी प्रकार से दुःख एवं दुःख-साधनों से द्वेष के कारण वह मनुष्य, उन दुःख-साधनों की प्राप्ति को कराने वाले दूसरे प्राणियों पर हिंसा करता या उनको हानि पहुँचाता, और उन दुःख-साधनों की प्राप्ति में प्रतिकूल = विरोधी दूसरे प्राणियों पर अनुग्रह भी करता हुआ, अपने-आप को उस दुःख से बचाना चाहता है। इस प्रकार से प्रयत्न करता हुआ मनुष्य पुनः धर्म-अधर्म का संचय करता है। और इस प्रकार से धर्माधर्म — रागद्वेष — पर-अनुग्रह-पीड़ा रूप छः अरों वाला संसारचक्र चलता रहता है। इस संसारचक्र का मूलकारण अविद्या है, जिसका व्याख्यान योगसूत्र २.५ में विस्तारपूर्वक किया गया है। यही अविद्या ही इस संसारचक्र को चलाने का प्रधान कारण है, और यही वासनाओं की उत्पत्ति का भी हेतु है। अतः भोज ने अविद्या को साक्षात् और राग-द्वेष को परम्परा से वासनाओं का हेतु कहा है।

२. फल :— जिसको आश्रय अर्थात् लक्ष्य बनाकर धर्म-अधर्म की उत्पत्ति होती है, वह फल कहा गया है। अर्थात् व्यक्ति लोक में जिस उद्देश्य को लक्ष्य करके, शुभाशुभ कर्म करता है, वह उद्देश्य ही फल है। उसी फल के आश्रय से धर्माधर्म की उत्पत्ति होती है, जो कि चित्त में संस्कार रूप से संचित हो जाता है। अतः वासनाओं की उत्पत्ति का दूसरा निमित्त फल रूप “लौकिक अथवा पारलौकिक लक्ष्य” कहा गया है, जिसके सम्पादन हेतु सभी प्रकार के शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्म किये जाते हैं।

३. आश्रय :— साधिकार मन = चित्त को वासनाओं का आश्रय कहा गया है। जब तक चित्त कृतकृत्य नहीं होता, तब तक सत्त्वादि गुणों की वृत्तियों के कारण, चित्त में वासनायें बनती रहती हैं। महर्षिव्यास ने योगसूत्र २.१५ की व्याख्या में “चलञ्च गुणवृत्तमिति क्षिपपरिणामि चित्तमुक्तम्” कहा है, जिसका तात्पर्य है कि सत्त्वादि गुणों का व्यापार चलता रहता है, अतः चित्त को शीघ्र परिणाम को प्राप्त होने वाला कहा है। इस प्रकार परिणामी चित्तरूप आश्रय के निमित्त से वासनाओं की उत्पत्ति होती है। जब चित्त कृतकार्य होता = गुणों के परिणाम से रहित होता है, तब आत्मा के समान पवित्र हो कर रहता है, तो ऐसे चित्त में वासनाओं की उत्पत्ति नहीं होती।

४. आलम्बन :— जिस किसी वस्तु अथवा विषय के उपस्थित होने पर जिस वासना की अभिव्यक्ति = प्रकटता होती है, वह वस्तु अथवा विषय उस वासना का आलम्बन कहा जाता है। चित्त में पूर्व में स्थित वासनायें, किसी भी सम्बद्ध विषय अथवा पदार्थ के उपस्थित होने पर, स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाती है, और पुरुष को उस विषय अथवा पदार्थ के सम्बन्ध में अन्य पूर्वकालिक अनुभव का वृत्त भी उपस्थित हो जाता है, इस प्रकार वर्त्तमान में उपस्थित हुए आलम्बन के कारण नई वासनाओं की उत्पत्ति हो जाती है।

इस प्रकार वासनाओं के चित्त में संगृहीत होने के चार कारण = हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन कहे गये हैं। जब तक ये चारों अथवा एक भी कारण उपस्थित रहता है, तब तक नई-नई वासनाओं का संग्रह होता रहेगा और पुरुष के लिए संसारचक्र चलता रहेगा। इससे निवृत्ति का उपाय यही है कि वासनाओं को उत्पन्न करने वाले चारों कारणों का अभाव सुनिश्चित करना होगा, तभी वासनाओं का अभाव हो सकेगा, अन्यथा नहीं। इन चारों कारणों की निवृत्ति के उपाय को निम्न प्रकार से जानना चाहिए —

“हेतु” की निवृत्ति के लिए अविद्या का नाश करना आवश्यक है;

“फल” की निवृत्ति के लिए “लौकिक एवं पारलौकिक लक्ष्यों = उद्देश्यों” से विरक्तता प्राप्त करनी चाहिए, जिसको महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र १.१५ में अपर वैराग्य कहा है;

“आश्रय” की निवृत्ति के लिए मन = चित्त को गुणों के अधिकार से रहित करने हेतु पुरुषार्थ करना होगा; और

“आलम्बन” की निवृत्ति के लिए यथासम्भव बाह्य एवं आन्तरिक आलम्बनों से सम्बन्ध रहित होना चाहिए, तथा विभिन्न उपस्थित आलम्बनों के स्वरूप को जानकर उनकी हेयता को अनुभव करना चाहिए, तभी उपस्थित आलम्बनों से वासनाओं का संग्रह नहीं हो पायेगा। इन चारों निमित्तों की निवृत्ति में पूर्व-पूर्व निमित्त की अपेक्षा उत्तर-उत्तर निमित्त की निवृत्ति में अधिक पुरुषार्थ करना होता है, क्योंकि पूर्व की अपेक्षा उत्तर वाले निमित्त का क्षेत्र अधिक व्यापक और सूक्ष्म है।

यहाँ वासनओं के अभाव का तात्पर्य यह नहीं है कि ये वासनायें सर्वथा समाप्त हो जाती है, किन्तु इनके अभाव का अर्थ है कि ये अपने कार्य को करने में समर्थ नहीं रहती। इसी रहस्य को अगले सूत्र द्वारा स्पष्ट किया गया है।