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अतीतानागतं स्वरूपतोस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम्॥१२॥

In Hindi:

पदपाठ : अतीतानागतम् स्वरूपतः अस्ति अध्वभेदात् धर्माणाम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : नास्त्यसतः सम्भवः, न चास्ति सतो विनाश इति द्रव्यत्वेन सम्भवन्त्यः कथं निवर्तिष्यन्ते वासना इति—

भूमिका हिंदी अर्थ : (असतः) असत् = सत्तारहित पदार्थ की (सम्भवः) उत्पत्ति = सत्ता (न अस्ति) नहीं हो सकती, (च) और (सतः) सत् = सत्तावान् पदार्थ का (विनाशः) विनाश (न अस्ति) नहीं हो सकता, (इति) इसलिये (द्रव्यत्वेन) द्रव्य के रूप में (सम्भवन्त्यः) वर्त्तमान = रहनी वाली (वासनाः) वासनायें (कथम्) किस प्रकार (निवर्तिष्यन्ते) निवृत्त होंगी ? (इति) इस को कहते हैं —

हिंदी में अर्थ : (धर्माणाम्) धर्मों के (अध्वभेदात्) अध्व = काल भेद होने से (अतीतानागतम्) अतीत = भूतकालिक और अनागत = भविष्यत्कालिक वस्तु भी (स्वरूपतः) अपने स्वरूप से (अस्ति) विद्यमान रहती है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : भविष्यद्व्यक्तिकमनागतम्। अनुभूतव्यक्तिकमतीतम्। स्वव्यापारोपारूढं वर्त्तमानम्। त्रयं चैतद्वस्तु ज्ञानस्य ज्ञेयम्। यदि चैतत्स्वरूपतो नाभविष्यन्नेदं निर्विषयं ज्ञानमुदपत्स्यत। तस्मादतीतानागतं स्वरूपतोऽस्तीति। किं च भोगभागीयस्य वापवर्गभागीयस्य वा कर्मणः फलमुत्पित्सु यदि निरुपाख्यमिति तदुद्देशेन तेन निमित्तेन कुशलानुष्ठानं न युज्येत। सतश्च फलस्य निमित्तं वर्त्तमानीकरणे समर्थं नापूर्वोपजनने। सिद्धं निमित्तं नैमित्तिकस्य विशेषानुग्रहणं कुरुते नापूर्वमुत्पादयति।

धर्मी चानेकधर्मस्वभावः। तस्य चाध्वभेदेन धर्माः प्रत्यवस्थिताः। न च यथा वर्त्तमानं व्यक्तिविशेषापन्नं द्रव्यतोस्त्येवमतीतमनागतं वा। कथं तर्हि? स्वेनैव व्यङ्ग्येन स्वरूपेणानागतमस्ति। स्वेन चानुभूतव्यक्तिकेन स्वरूपेणातीतमिति। वर्त्तमानस्यैवाध्वनः स्वरूपव्यक्तिरिति न सा भवत्यतीतानागतयोरध्वनोः। एकस्य चाध्वनः समये द्वावध्वानौ धर्मिसमन्वागतौ भवत एवेति नाभूत्वा भावस्त्रयाणामध्वनामिति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (भविष्यद् व्यक्तिकम्) भविष्यत् में अभिव्यक्त होने वाला पदार्थ (अनागतम्) “अनागत” कहलाता है। (अनुभूतव्यक्तिकम्) पूर्व में अनुभव की गई अभिव्यक्ति वाला पदार्थ (अतीतम्) “अतीत” कहलाता है। और (स्वव्यापारोपारूढम्) अभिव्यक्ति रूप अपने व्यापार में विद्यमान पदार्थ (वर्त्तमानम्) “वर्त्तमान” कहलाता है। (च) और (एतत्) ये (त्रयम् वस्तु) तीनों अनागत, अतीत और वर्त्तमान पदार्थ (ज्ञानस्य) ज्ञान के (ज्ञेयम्) विषय बनते हैं। (च) और (यदि) यदि (एतत्) ये तीनों पदार्थ (स्वरूपतः) स्वरूप से (न अभविष्यत्) विद्यमान नहीं होते तो (इदम् निर्विषयम् ज्ञानम्) विषय रहित होने से यह ज्ञान (न उदपत्स्यत) उत्पन्न न हो सके। (तस्मात्) इसलिये (इन पदार्थों = विषयों का ज्ञान होने से) (अतीतानागतम्) अतीत और अनागत पदार्थ (स्वरूपतः) अपने-अपने रूप से (अस्ति) विद्यमान रहते हैं, (इति) यह सिद्ध होता है। इन पदार्थों की सिद्धि में अन्य तर्क देते हैं (किम् च) और इसके अतिरिक्त (भोगभागीयस्य वा अपवर्गभागीयस्य वा कर्मणः) भोगों को सिद्ध करने वाले अथवा अपवर्ग को सिद्ध करने वाले कर्म से (उत्पित्सु फलम्) उत्पन्न होने वाला फल (यदि) यदि (निरुपाख्यम् इति) उपाख्याहीन हो = असत् हो, तो (तत् उद्देशेन) उसके उद्देश्य से अर्थात् (तेन निमित्तेन) उस निमित्त = प्रयोजन से (कुशलानुष्ठानम्) उत्तम धर्मादि का अनुष्ठान (न युज्येत) युक्त नहीं होगा। यथार्थ में (सतः च फलस्य) विद्यमान अनागत अव्यक्त रूप फल को ही (वर्त्तमानीकरणे) वर्त्तमान रूप में लाने को = अभिव्यक्त करने में (निमित्तम्) धर्मादि रूप निमित्त (समर्थम्) समर्थ है, (अपूर्वोपजनने न) अपूर्व = असत् पदार्थ को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं। (सिद्धम् निमित्तम्) सिद्ध = वर्त्तमान् अवस्था वाला निमित्त = कारण (नैमित्तिकस्य) निमित्त से होने वाले कार्य = फल को (विशेषानुग्रहणम् कुरुते) अभिव्यक्त करने में विशेष सहायता करता है, (अपूर्वम्) अविद्यमान = असत् फल को (न उत्पादयति) उत्पन्न नहीं करता।

(च) और (धर्मी) धर्मी (=पदार्थ) (अनेकधर्मस्वभावः) अनेक धर्मों से युक्त स्वभाव वाला होता है। (तस्य च) और उस धर्मी के (धर्माः) धर्म (अध्वभेदेन) अध्व = काल भेद से (प्रत्यवस्थिताः) उसमें विद्यमान रहते हैं। (च) और (यथा) जैसे (वर्त्तमानम्) वर्त्तमान् धर्म (व्यक्तिविशेषापन्नम्) विशिष्ट अभिव्यक्ति से सम्पन्न होकर (द्रव्यतः) द्रव्य रूप से (अस्ति) रहता है, (एवम्) वैसे (अतीतमनागतम् वा) अतीत और अनागत धर्म (न) नहीं रहते। (कथम् तर्हि?) तो कैसे रहते हैं ? (अनागतम्) अनागत धर्म (स्वेनैव व्यङ्ग्येन स्वरूपेण) अपने ही व्यङ्ग्य = परोक्ष स्वरूप से = भविष्यत् में अभिव्यक्त होने वाले रूप से (अस्ति) रहता है; (च) और (अतीतम्) अतीत धर्म (स्वेन अनुभूतव्यक्तिकेन स्वरूपेण इति) अपने पूर्वानुभूत अभिव्यक्ति वाले स्वरूप से रहता है। इससे (वर्त्तमानस्य अध्वनः एव) वर्त्तमान् धर्म के समय में ही (स्वरूपव्यक्तिः इति) धर्मी के स्वरूप की अभिव्यक्ति होती है; (अतीतानागतयोः अध्वनोः) अतीत और अनागत धर्मों की स्थिति के समय में (सा) वह स्वरूप की अभिव्यक्ति (न भवति इति) नहीं होती। (च) और (एकस्य अध्वनः समये) धर्मी के एक धर्म की विद्यमानता में (द्वौ अध्वनौ) शेष दो धर्म अव्यक्त स्वरूप में (धर्मिसमन्वागतौ भवतः एव) उसी धर्मी में समन्वित रहते ही हैं। (इति) इस प्रकार से (त्रयाणाम् अध्वानाम्) तीनों काल में रहने वाले धर्मों का (अभूत्वा भावः न) “अभाव से भाव में आना” नहीं होता (इति) यह सिद्धान्त है॥

वैदिक वृत्ति : पिछले सूत्र में “हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन रूप निमित्तों का अभाव होने पर वासनाओं का अभाव होता है” यह प्रतिपादित किया गया है। परन्तु क्या किसी सत्तावान् पदार्थ का अभाव सम्भव है ? क्या वासनाओं का तत्त्वरूप से विनाश हो जाता है ? जबकि शास्त्रकारों की यह मान्यता है कि असत् पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती और सत् = सत्तावान् पदार्थ का विनाश नहीं हो सकता, इसलिये वासनाओं का नाश होना सम्भव न होने से, इनकी निवृत्ति किस प्रकार से होगी ? इस शंका का समाधान इस सूत्र द्वारा किया जा रहा है। सत्कार्यवाद के सिद्धान्त को महर्षि पतञ्जलि ने भी माना है, जिसका प्रतिपादन योगसूत्र ३.१३-१४ की व्याख्या में मिलता है।

इस शंका का समाधान समझने से पूर्व यह जानना चाहिए कि महर्षि कणाद ने वैशेषिक शास्त्र में पाँच प्रकार के अभाव को कहा है, जो कि निम्न प्रकार से हैं —

१. प्राग्-अभाव :— क्रियागुणव्यपदेशाभावात् प्रागसत्॥ वैशेषिक० ९.१.१॥ क्रिया और गुण के विशेष निमित्त के प्राक् अर्थात् पूर्व असत् = न था। जैसे घट, वस्त्रादि उत्पत्ति से पूर्व नहीं थे, इसका नाम “प्रागभाव” है। अर्थात् उत्पत्ति से पूर्व कार्य कारण में विद्यमान तो रहता है। (यह पदार्थ के अनागत स्वरूप को दर्शाता है।)

२. प्रध्वंसाभाव :— सदसत्॥ वैशेषिक० ९.१.२॥ जो होके न रहे। जैसे घट उत्पन्न होके नष्ट हो गया, यह “प्रध्वंसाभाव” कहाता है। (यह पदार्थ के अतीत स्वरूप को दर्शाता है।)

३. अन्योन्याभाव :— सच्चासत्॥ वैशेषिक० ९.१.४॥ जो होवे और न होवे। जैसे “अगौरश्वौऽनश्वौ गौः” यह घोड़ा गाय नहीं और गाय घोड़ा नहीं अर्थात् घोड़े में गाय का और गाय में घोड़े का अभाव और गाय में गाय, घोड़े में घोड़े का भाव है। यह “अन्योन्याभाव” कहाता है।

४. अत्यन्ताभाव :— यच्चान्यदसदतस्तदसत्॥ वैशेषिक० ९.१.५॥ जो पूर्वोक्त तीनों अभावों से भिन्न है, उसको “अत्यन्ताभाव” कहते हैं। जैसे “नरशृङ्ग” अर्थात् मनुष्य का सींग, “खपुष्प” आकाश का फूल और “बन्ध्या-पुत्र” बन्ध्या का पुत्र इत्यादि।

५. संसर्गाभाव :— नास्ति घटो गेह इति सतो घटस्य गेह संसर्गप्रतिषेधः॥ वैशेषिक० ९.१.१०॥ घर में घड़ा नहीं अर्थात् अन्यत्र है, घर के साथ घड़े का सम्बन्ध नहीं है। यह संसर्गाभाव है।

फिर कहा भी है कि —

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः॥ गीता २.१६॥

अर्थात् असत् का कभी भाव = वर्त्तमान और सत् का कभी अभाव = अवर्त्तमान नहीं होता। ऐसा तत्त्वदर्शी लोगों ने माना है। ऐसे में सत्तावान् वासनाओं का अभाव = नाश कैसे हो ? महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि धर्मों के काल भेद होने से, अतीत और अनागत धर्मीर् = वस्तु अपने स्वरूप से विद्यमान रहती है। अतः वासनाओं का अत्यन्ताभाव नहीं होता।

अतीत एवं अनागत पदार्थ के विषय को स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि भविष्यत् काल में अभिव्यक्त = उत्पत्ति को प्राप्त होने वाला पदार्थ अनागत कहलाता है; तथा जिस की अभिव्यक्ति पूर्व में अनुभूत कर ली गई है, वह पदार्थ अतीत कहलाता है। और जिसकी अभिव्यक्ति = उत्पत्ति इस काल में उपलब्ध है वह पदार्थ वर्त्तमान कहलाता है। जैसे जब तक घट की उत्पत्ति नहीं हुई, तब तक “घट” अनागत; जब बन कर उपलब्ध होता, तब “घट” वर्त्तमान; और जब टूट कर ढीकरा / मिट्टी बन जाता है, तब “घट” अतीत पदार्थ होता है। इन तीनों की प्रकार से “घट” रूप पदार्थ, ज्ञान का विषय बनता है; क्योंकि यदि अनागत “घट” और अतीत “घट” स्वरूप से विद्यमान न हों तो इनका ज्ञान भी नहीं हो सकता। इसलिये अनागत और अतीत पदार्थ का ज्ञान होने से वर्त्तमान के साथ-साथ अनागत और अतीत पदार्थ भी सत्तावान् माना गया है। अतीत और अनागत पदार्थों की सत्ता में महर्षि व्यास ने एक और तर्क दिया है — भोगों अथवा अपवर्ग की सिद्धि हेतु सम्पादन किये जाने वाले कर्मों से उत्पन्न होने वाला फल (=भोग अथवा अपवर्ग) यदि सत्ताहीन हो तो, ऐसे सत्ताहीन उद्देश्य के लिए कौन बुद्धिमान् व्यक्ति धर्मादि के अनुष्ठान रूप पुरुषार्थ को करेगा ? क्योंकि उस किये जाने वाले शुभ कर्मों का फल तो अनागत है, परन्तु फल के सत्तावान् होने और भविष्यत् में उसकी प्राप्ति होने से, उसके अस्तित्व का निषेध नहीं हो सकता। कोई भी धर्मानुष्ठान रूपी निमित्त, उसे धर्मानुष्ठान के होने वाले फल को, अभिव्यक्त करने में ही कारण होता है, किसी काल्पनिक एवं असत् फल को उत्पन्न नहीं कर सकता।

कोई भी धर्मी = पदार्थ वस्तुतः अनेक धर्मों से युक्त होता है; और ये धर्म उस धर्मी में काल भेद से विद्यमान रहते हैं। परन्तु जैसे वर्त्तमान धर्म अभिव्यक्त होकर रहता है, वैसे अतीत और अनागत धर्म नहीं रहते — क्योंकि अनागत धर्म भविष्यत् में अभिव्यक्त होने वाले रूप से रहता है, और अतीत धर्म अपनी पूर्वानुभूत अभिव्यक्ति वाले रूप से रहता है। इसी कारण से वर्त्तमान धर्मों की अभिव्यक्ति वाले काल में पदार्थ का स्वरूप प्रकट रहता और पदार्थ उपलब्ध रहता है; परन्तु अतीत धर्म पहले अभिव्यक्त हो चुकने से, और अनागत धर्म भविष्यत् में अभिव्यक्त होने से, पदार्थ के स्परूप को या तो अभिव्यक्त कर चुके होते हैं, या आगे आने वाले काल में अभिव्यक्त करने में समर्थ होंगे। अतः धर्मी केवल वर्त्तमान धर्मों के साथ ही अभिव्यक्त होता, और शेष दोनों धर्म इसी धर्मी में ही युक्त रहते हैं। अतः कोई भी असत् पदार्थ सत्ता में नहीं आता और न ही किसी सत् पदार्थ का अत्यन्ताभाव होता है।

जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया है कि किसी भी अनागत पदार्थ का प्राग्-अभाव होता है और अतीत पदार्थ का प्रध्वंसाभाव होता है; वासनाओं के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार से समझना चाहिए। किसी भी प्राणी द्वारा अनुभूत हुई वासनाओं का प्रध्वंसाभाव है; और वर्त्तमान जन्म में शरीर-विशेष के अनुसार प्रकट हुई वासनाओं की अभिव्यक्ति उनकी वर्त्तमानकालिक अवस्था है; और चित्त में अन्य सभी शरीरों से सम्बन्धित वासनओं का प्राग्-अभाव है। इसी प्रकार योगाभ्यास के सम्यक् अनुष्ठान से हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन रूप निमित्तों के अभाव होने पर वासनाओं का अत्यन्ताभाव नहीं होता, किन्तु वे वासनायें फलोत्पत्ति में असमर्थ हो जाती हैं, और चित्त कृतकृत्य हुआ पुरुष = आत्मा के समान पवित्र होकर स्थित होता है। ऐसे पुरुष के लिए शास्त्रकार ने शरीरपात् के पश्चात् ईश्वर की व्यवस्था में अपवर्ग की प्राप्ति को कहा है। मुक्ति के काल में वासनाओं की अभिव्यक्ति नहीं होती, तो इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वासनाओं का सर्वथा अभाव हो गया है क्योंकि —

न तु कार्याभावात्कारणाभावः॥ वैशेषिक० १.२.२॥

अर्थात् कार्य के अभाव होने से कारण का अभाव नहीं होता। अतः मुक्तिकाल में सांसारिक भोगों की प्राप्ति न होने से अभुक्त कर्माशय तथा वासनाओं का अभाव प्रमाणित नहीं होता। इसलिये मुक्ति के काल के पश्चात् पुनः ये वासनायें अभिव्यक्त होकर पुरुष को शरीर प्राप्त कराने में समर्थ होती हैं। अतः वासनाओं का अत्यन्ताभाव न होकर प्राग्-अभाव अथवा प्रध्वंसाभाव ही होता है।