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ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः॥१३॥

In Hindi:

पदपाठ : ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः॥

हिंदी में अर्थ : (ते) तीनों कालों में रहने वाले धर्म (धर्मी में अनुगत अर्थात् पदार्थ मात्र) (व्यक्तसूक्ष्मा) व्यक्त = प्रकट और सूक्ष्म = अप्रकट (गुणात्मानः) सत्त्वादि गुणों के स्वरूप हैं॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : ते खल्वमी त्र्यध्वानो धर्मा वर्त्तमाना व्यक्तात्मानोऽतीतानागताः सूक्ष्मात्मानः षडविशेषरूपाः । सर्वमिदं गुणानां सन्निवेश विशेषमात्रमिति परमार्थतो गुणात्मानः। तथा च शास्त्रानुशासनम्—

गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति।

यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायेव सुतुच्छकम्॥ इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (ते खलु अमी) वे ही ये (त्र्यध्वानः धर्माः) तीनों कालों = अतीत, वर्त्तमान और अनागत में रहने वाले धर्म, जो धर्मी की शक्तिरूप से होते हैं, (वर्त्तमानाः व्यक्तात्मानः) वर्त्तमान काल में अभिव्यक्त स्वरूप वाले होते हैं; और जो (अतीतानागताः) अतीत और अनागत काल में (सूक्ष्मात्मानः) सूक्ष्म = अनभिव्यक्त स्वरूप वाले, और (षडविशेषरूपाः) अविशेष रूप = सामान्य रूप से छः प्रकार के होते हैं। (सर्वम् इदम्) यह समस्त प्रकृतिजन्य विश्व (गुणानाम्) सत्त्वादि गुणों का (सन्निवेश विशेषमात्रम्) भिन्न-भिन्न प्रकार के सम्मिश्रण से रचना विशेष मात्र है, (इति) इसलिये (परमार्थतः) वास्तव में (गुणात्मानः) सत्त्वादि गुणरूप ही है। (तथा च) और वैसा ही (शास्त्रानुशासनम्) शास्त्र का उपदेश भी है — (गुणानाम्) सत्त्वादि गुणों का (परमम् रूपम्) परम रूप = वास्तविक रूप (दृष्टिपथम्) दृष्टिपथ को (न ऋच्छति) प्राप्त नहीं होता, अर्थात् इन्द्रियों से ग्रहण नहीं होता। (यत् तु) और गुणों का जो रूप (दृष्टिपथम् प्राप्तम्) दृष्टिगोचर होता है, (तत्) वह रूप (माया इव) माया के समान (सुतुच्छकम् इति) विनाशी होने से तुच्छ है॥

वैदिक वृत्ति : इस सूत्र में धर्म और धर्मी के रूप को स्पष्ट किया जा रहा है। प्रकृति सत्त्व, रज और तम गुणों का समुदाय, जड़ पदार्थ है, जो कि सर्वथा सूक्ष्मतम रूप में रहती है। जड़ पदार्थों में इससे सूक्ष्म अन्य कोई पदार्थ नहीं है। अतः शास्त्रकारों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सत्त्वादि गुणों का वास्तविक रूप दृष्टि गोचर नहीं होता। इससे केवल नेत्रेन्द्रिय द्वारा ग्रहण का निषेध न जानना चाहिए, बल्कि अन्य इन्द्रियों द्वारा भी इनका रूप ग्रहण नहीं होता, ऐसा अभिप्राय है।

प्रकृति के जो विकार हैं, वे महत्तत्त्व से लेकर महाभूतों पर्यन्त २३ गिने गए हैं, वे व्यक्त और सूक्ष्म रूप वाले हैं अर्थात् प्रकट एवं सूक्ष्म = अप्रकट रूप वाले हैं। इनमें से भी पृथिवी, जल और अग्नि महाभूत तथा इनके धर्मपरिणाम नेत्रेन्द्रिय द्वारा ग्रहण होते हैं, महाभूतों में वायु का ग्रहण त्वगेन्द्रिय तथा आकाश के शब्दगुण का ग्रहण श्रोत्रेन्द्रिय से होता है, शेष अन्य १८ परिणाम = विकार ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं होते, तथा सूक्ष्मता के विभिन्न स्तरों पर होते हैं।

महर्षि व्यास ने तीनों कालों में रहने वाले धर्मों में से वर्त्तमान काल में होने वाले धर्मों को व्यक्तरूप वाला कहा है; और अतीत और अनागत कालिक धर्मों को अप्रकट रूप = सूक्ष्म रूप वाला कहा है। वस्तुतः यहाँ यह जानना चाहिए कि धर्म, धर्मी = पदार्थ के आश्रित रहते हैं। अर्थात् धर्मों की वर्त्तमान कालिक अवस्था में पदार्थ व्यक्त रहता है और धर्मों की शेष दो अवस्थाओं में पदार्थ अव्यक्त = सूक्ष्म रूप से रहता है। यहाँ महर्षि व्यास ने व्यक्त और सूक्ष्म रूप के साथ “षडविशेषरूपाः” कहा है, अर्थात् धर्मों की व्यक्त अवस्था छः अविशेष = सामान्य रूप की होती हैं, जिसको निरुक्त १.२ में “जायते, अस्ति, विपरिणमते, वर्धते, अपक्षीयते, विनश्यतीति” = उत्पन्न होना, वर्त्तमान होना, परिणाम को प्राप्त होना, वढ़ना, घटना और नष्ट होना, कहा है। ये छः अवस्थायें प्रकृति के सभी तत्त्वान्तर एवं धर्म परिणामों में दृष्टिगोचर होती हैं।

प्रकृति के सभी विकार = धर्मी, जो त्रिकालिक धर्मों से युक्त हैं, सत्त्वादि गुणों के ही स्वरूप हैं। ये सभी विकार = धर्मी, सत्त्व, रज और तम गुणों के भिन्न-भिन्न मिश्रणों से बने हैं। इसी कारण कोई पदार्थ सत्त्वगुण प्रधान होता है, तो कोई पदार्थ रजोगुण प्रधान होता है और कोई पदार्थ तमोगुण प्रधान होता है, तथा अन्य दो गुण गौण रूप से रहते हैं। इसीलिये सभी पदार्थों को सत्त्वादि गुण रूप ही माना गया है।

क्योंकि सत्त्वादि गुणों का वास्तविक रूप तो दृष्टिगोचर नहीं होता, अतः तत्त्वान्तर परिणाम और धर्म परिणामों के रूप में गुणों का जो रूप इन्द्रियों से ग्रहण होता है, वह भी विनाशशील होने से तुच्छ ही कहा गया है, अर्थात् वह माया के समान तुच्छ है। इसमें रहस्य यह है कि धर्मों की वर्त्तमान कालिक अवस्था में उपलब्ध होने वाले विकार = पदार्थ, अभिव्यक्ति से पूर्व नहीं थे, और उपलब्धि के पश्चात् परिणाम को प्राप्त होते हुए, वृद्धि और ह्रास को क्रमशः प्राप्त होते हुए अन्त में नष्ट हो जायेंगे। अतः पूर्व और पश्चात् की अवस्था में अव्यक्त रूप में रहने वाला पदार्थ विनाशी है, और अपरिणामी पुरुष की अपेक्षा से हेय = तुच्छ कहा गया है। पदार्थों के इसी रूप को जानना कैवल्य पथ के पथिक के लिए परमावश्यक है।

यहाँ माया शब्द से आचार्य शंकर द्वारा कल्पित माया को नहीं जानना चाहिए, क्योंकि उनके अनुसार माया का अर्थ है — जो वस्तु न हो और भासे = ज्ञात हो; इसको अनिर्वचनीय भी माना है अर्थात् जो न सत् हो, न असत् हो। यहाँ भाष्यकार महर्षि व्यास ने सभी पदार्थों को सत्त्वादि गुण रूप कहा है, और सत्त्वादि गुण सत्तावान् हैं, इनके तत्त्वान्तर और धर्म परिणाम धर्मों की वर्त्तमान कालिक अवस्था में उपलब्ध होते हैं। पदार्थों का इस प्रकार से यथार्थ ज्ञान होना, विवेकख्याति हेतु आवश्यक है। दूसरी ओर अद्वैतवाद के मूल सिद्धान्त के रूप में आचार्य शंकर ने ब्रह्म को ही एकमात्र नित्य सत्ता माना है, जीव = पुरुष और प्रकृति की पृथक् सत्ता को स्वीकार नहीं किया तथा माया के कारण ही ब्रह्म के ईश्वर, जीव आदि भेद कहे हैं। जबकि महर्षि व्यास ने ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनों को नित्य माना गया है। योगदर्शन में इन तीनों का अलग-अलग निरूपण वेदादि सत्यशास्त्रों के अनुकूल ही किया गया है, यथा —

१. क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः॥ १.२४॥ से ईश्वर;

२. तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥१.३॥ से पुरुष = जीव; तथा

३. प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्॥ २.१८॥ से प्रकृति॥

अतः योगदर्शन में इन तीनों का पृथक्-पृथक् निरूपण होने से आचार्य शंकर द्वारा प्रतिपादित अद्वैतवाद का कोई आधार न तो योगदर्शन में और न ही वेदादि सत्यशास्त्रों में है॥