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परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम्॥१४॥

In Hindi:

पदपाठ : परिणामैकत्वात् वस्तुतत्त्वम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : यदा तु सर्वे गुणाः कथमेकः शब्दः एकमिन्द्रियमिति—

भूमिका हिंदी अर्थ : (यदा तु) जब (सर्वे) सभी पदार्थ (गुणाः) सत्त्वादि गुण रूप ही हैं, तो उन पदार्थों में (एकः शब्दः) शब्द एक है, (एकम् इन्द्रियम्) इन्द्रिय एक है, (कथम्) यह व्यवहार किस प्रकार होता है ? (इति) इस शंका के विषय में कहते हैं—

हिंदी में अर्थ : (परिणामैकत्वात्) सत्त्वादि गुणों के भिन्न-भिन्न मिश्रण का परिणाम एक होने से (वस्तुतत्त्वम्) परिणत पदार्थ एक वस्तु के रूप से सिद्ध होता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : प्रख्याक्रियास्थितिशीलानां गुणानां ग्रहणात्मकानां करणभावेनैकः परिणामः श्रोत्रमिन्द्रियं, ग्राह्यात्मकानां शब्दतन्मात्रभावेनैकः परिणामः शब्दो विषय इति, शब्दादीनां मूर्त्तिसमानजातीयानामेकः परिणामः पृथिवीपरमाणुस्तन्मात्रावयवः। तेषां चैकः परिणामः पृथिवी गौर्वृक्षः पर्वत इत्येवमादिर्भूतान्तरेष्वपि स्नेहौष्ण्यप्रणामित्वावकाशदानान्युपादाय सामान्यमेकविकारारम्भः समाधेयः।

नास्त्यर्थो विज्ञानविसहचरः। अस्ति तु ज्ञानमर्थविसहचरं स्वप्नादौ कल्पितमित्यनया दिशा ये वस्तुस्वरूपमपह्नुवते ज्ञानपरिकल्पनामात्रं वस्तु स्वप्नविषयोपमं न परमार्थतोऽस्तीति ये आहुस्ते तथेति प्रत्युपस्थितमिदं स्वमाहात्म्येन वस्तु कथमप्रमाणात्मकेन विकल्पज्ञानबलेन वस्तुस्वरूपमुत्सृज्य तदेवापलपन्तः श्रद्धेयवचनाः स्युः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (प्रख्याक्रियास्थितिशीलानाम्) प्रख्या = प्रकाश, क्रिया = प्रवृत्ति, स्थिति स्वभाव वाले (गुणानाम्) सत्त्व, रज और तम गुणों का, (ग्रहणात्मकानाम्) ग्रहणात्मक = विषयों को ग्रहण करने की क्षमता वाले, (करणभावेन) करण रूप = इन्द्रिय रूप से (एकः परिणामः) एक परिणाम (श्रोत्रम् इन्द्रियम्) श्रोत्र इन्द्रिय = कर्णेन्द्रिय है। (ग्राह्यात्मकानाम्) ग्राह्यात्मक = विषय रूप से ग्रहण होने की क्षमता वाले, (शब्दतन्मात्रभावेन) शब्दतन्मात्रा रूप से (एकः परिणामः) एक परिणाम (शब्दः विषयः इति) शब्द विषय है। और (मूर्त्तिसमानजातीयानाम् शब्दादीनाम्) मूर्त्ति = कठोरता आदि रूप समान जातीय शब्दादि पाँच तन्मात्राओं का (एकः परिणामः) एक परिणाम (तन्मात्रावयवः पृथिवीपरमाणुः) पृथिवी परमाणु रूप तन्मात्राओं का अवयव है। (च) और (तेषाम्) उन पृथिवी परमाणुओं का (एकः परिणामः) एक परिणाम (पृथिवी) पृथिवी नामक महाभूत, (गौः वृक्षः पर्वतः आदि इति) गौ, वृक्ष, पर्वत आदि अन्य पार्थिव पदार्थ हैं। (एवम्) इस प्रकार (भूतान्तरेषु अपि) अन्य भूतों = जल, अग्नि, वायु, आकाश रूप भूतों में भी (स्नेहौष्ण्यप्रणामित्वावकाशदानानि) स्नेह, उष्णता, प्रणामित्व (=गति, वहनशीलता), अवकाश प्रदान रूप धर्मों को (उपादाय) लेकर (सामान्यम्) सजातीय (एकविकारारम्भः) एक विकार का आरम्भ (समाधेयः) जानना चाहिए।

क्षणिकवाद का निराकरण — (विज्ञानविसहचरः) विज्ञान से पृथक् = अतिरिक्त (अर्थः) कोई पदार्थ (न अस्ति) नहीं है, (अर्थविसहचरम्) अर्थ से भिन्न = सत् पदार्थ से भिन्न ज्ञान (स्वप्नादौ कल्पितम्) स्वप्नादि में कल्पित के समान (तु) तो (अस्ति) है। (इति) इस प्रकार (अनया दिशा) इस दिशा = इस युक्ति से (ये) जो लोग (वस्तुस्वरूपम्) वस्तु के स्वरूप = अस्तित्त्व का (अपह्नुवते) निषेध करते हैं, अर्थात् सभी जड़ पदार्थ (ज्ञानपरिकल्पनामात्रम्) ज्ञान की कल्पना मात्र हैं, (स्वप्नविषयोपमम् वस्तु) स्वप्न काल में अनुभव होने वाले पदार्थ के समान होते हैं, (परमार्थतः न अस्ति) वास्तविक रूप से नहीं होते, (इति) यह (ये आहुः) जो कहते हैं, (ते) वे लोग (तथा इति) इस प्रकार (स्वमाहात्म्येन) अपनी सत्ता की महिमा से (प्रत्युपस्थितम्) विद्यमान, इन्द्रिय सन्निकर्ष से उपलब्ध = उपस्थित (इदम् वस्तु) इस वस्तु को, (अप्रमाणात्मकेन) प्रमाणहीन (विकल्पज्ञानबलेन) विकल्प ज्ञान के बल से = स्वप्न ज्ञान के दृष्टान्त के बल से (वस्तुस्वरूपम्) वस्तु के वास्तविक स्वरूप को (उत्सृज्य) छोड़कर, (तदेव) उस वस्तु की सत्ता का (अपलपन्तः) अपलाप = खण्डन करते हुए (कथम्) किस प्रकार (श्रद्धेयवचनाः स्युः) विश्वसनीय होंगे ? अर्थात् उनका कथन श्रद्धा के योग्य नहीं॥

वैदिक वृत्ति : धर्मी मात्र को पिछले सूत्र में सत्त्वादिगुण रूप कहा गया है। अतः जब सभी व्यक्त एवं सूक्ष्म रूप से उपलब्ध पदार्थ सत्त्वादि गुणों के ही परिणाम हैं, ऐसे में पदार्थों की भिन्न-भिन्न संज्ञा क्यों होती है ? यह एक शब्द है; यह एक इन्द्रिय है इस प्रकार का व्यवहार किस प्रकार से सम्भव है ? इस शंका का समाधान करते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि सत्त्व, रज और तम गुणों का प्रधान-गौण भाव से एक परिणाम होने से वस्तु की पदार्थ रूप से एकता सिद्ध होती है। पिछले सूत्र के भाष्य में महर्षि व्यास ने “सन्निवेशविशेषमात्रम्” पद का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है कि सभी पदार्थ सत्त्वादि गुणों के भिन्न-भिन्न प्रकार के मिश्रण से रचना = उत्पत्ति को प्राप्त होते हैं। इस रहस्य को इस प्रकार से समझना चाहिए — सत्त्व, रज और तम रूप तीनों गुण अङ्ग-अङ्गी = गौण-प्रधान भाव से गति करते हुए परिणाम को प्राप्त होते हैं। इसमें कहीं पर सत्त्व गुण प्रधान तथा रज और तम गुण गौण रहते हैं; कहीं पर रज गुण प्रधान तथा सत्त्व और तम गुण गौण रहते हैं; इसी प्रकार कहीं पर तम गुण प्रधान तथा सत्त्व और रज गुण गौण रहते हैं। इस प्रकार के विचित्र सम्मिश्रण से परिणाम की भिन्नता को जाना जाता है। सत्त्वादि गुणों की कार्यता / विशेषताओं को योगसूत्र २.१८ की व्याख्या में स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार से सत्त्वादि गुण गौण अथवा प्रधान रूप से स्थित होकर पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले होते हैं। उस सूत्र की व्याख्या में गुणों की १० विशेषताओं / कार्य-स्थितियों को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है।

यहाँ इस सूत्र में महर्षि व्यास इसको स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि प्रकाश, प्रवृत्ति और स्थिति स्वभाव वाले सत्त्व, रज और तम गुण विभिन्न मिश्रणों में सम्मिलित हुए विभिन्न परिणामों को प्राप्त करते हैं, उनमें से एक परिणाम श्रोत्रेन्द्रिय रूप में उपलब्ध होता है; इसी प्रकार अन्य ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों रूप पदार्थों में भी सत्त्वादि गुण भिन्न-भिन्न प्रकार के मिश्रण से युक्त होकर उस-उस इन्द्रिय रूप परिणाम को प्राप्त होते हैं। ये इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने की क्षमता वाली होती हैं। इन्हीं सत्त्वादि गुणों से ही विषय के रूप में ग्रहण होने वाले शब्दतन्मात्रा रूप से शब्द-विषय रूप परिणाम होता है; इसी प्रकार रूप, रस, गन्ध और स्पर्श तन्मात्रा रूप से उस-उस तन्मात्रा (=रूप, रस, गन्ध, स्पर्श तन्मात्रा) विषय रूप परिणाम होता है। इन्हीं शब्दादि तन्मात्राओं से कठोरता धर्म को लेकर पृथिवी परमाणुओं का; स्नेहता धर्म को लेकर जलीय परमाणुओं का; उष्णता धर्म को लेकर अग्नि परमाणुओं का; गति = वहनशीलता धर्म को लेकर वायव परमाणुओं का और अवकाश प्रदान रूप धर्म को लेकर आकाश के परमाणुओं का निर्माण होता है। आगे इन पृथिवी परमाणुओं से पृथिवी, गौ, वृक्ष, पर्वत आदि पदार्थ बनते हैं; और इसी प्रकार जल, अग्नि, वायु और आकाश के परमाणुओं से समान जाति वाले जल, अग्नि, वायु और आकाश महाभूत रूप विकारों का निर्माण होता है। इन सभी विकारों में विभिन्न प्रकार का परिणाम होने में, सत्त्वादि गुणों का भिन्न-भिन्न प्रकार का मिश्रण तथा उनका गौण-प्रधान भाव से स्थित होना मुख्य कारण होता है। इस प्रकार विभिन्न परिणामों में उत्पत्ति को प्राप्त हुआ विकार, भिन्न पदार्थ रूप में होता हुआ, वस्तु तत्त्व के रूप में जाना जाता और व्यवहार में आता है।

इस सूत्र के भाष्य में महर्षि व्यास ने क्षणिकवाद = विज्ञानवाद की मान्यता का निराकरण किया है। इन लोगों की यह मान्यता है कि वस्तु की कोई सत्ता ही नहीं है, वह केवल ज्ञानमात्र है। मनुष्य को कोई भी ज्ञान पदार्थ की सत्ता के बिना स्वप्न की भाँति होता है। जैसे स्वप्न में पदार्थ नहीं होता परन्तु उसका ज्ञान / अनुभव होता है, उसी प्रकार से लोक में भी पदार्थ के न होने पर भी ज्ञान से पदार्थ रूप में हो जाते हैं। महर्षि व्यास कहते हैं कि यह मान्यता निम्न कारणों से श्रद्धा = विश्वास के योग्य नहीं है—

— बाह्यजगत् में जड़ पदार्थ अपनी सत्ता की महिमा से पुरुषों को इन्द्रियों के सन्निकर्ष द्वारा उपलब्ध होते हैं, जबकि चित्त में ज्ञानमात्र हेतु इन्द्रिय सन्निकर्ष की इस प्रकार से आवश्यकता नहीं होती।

— अप्रमाणिक एवं कल्पित ज्ञान अर्थात् मात्र स्वप्नज्ञान के दृष्टान्त के बल से, पदार्थ की सत्ता का निषेध नहीं हो सकता। इसमें यह कारण है कि स्वप्न में ज्ञात / अनुभव होने वाला पदार्थ, पुरुष द्वारा जाग्रत अवस्था में देखा अथवा सुना हुआ होता है, और उन्हीं देखे एवं सुने पदार्थों के संस्कार चित्त में रहते हैं। स्वप्न में पुरुष इन्हीं चित्तगत संस्कारों को ही व्यवस्थित अथवा अव्यवस्थित रूप से देखता है। ऐसे में वास्तविक पदार्थ के दृष्ट अथवा श्रुत ज्ञान के आधार पर, स्वप्नावस्था में हुए विकल्परूप = वस्तुशून्य स्वप्नज्ञान को आधार मानकर, वस्तु तत्त्व की सत्ता का ही निषेध करना, किस प्रकार से युक्त हो सकता है ? अतः ऐसे क्षणिकवादियों का कथन कदापि विश्वसनीय नहीं है। इसलिये “पदार्थ ज्ञानमात्र है, परमार्थतः नहीं होता” यह मान्यता वास्तविकता से विरुद्ध है।

इसी प्रकार वस्तुओं को परमाणुओं का समुदाय मानने वालों की मान्यता का खण्डन महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.४३ की व्याख्या में किया है। जिज्ञासु पाठक इसे यथास्थान देखें।

क्षणिकवाद की मान्यता का अन्य प्रकार / तर्क से खण्डन, महर्षि पतञ्जलि भी अगले सूत्र द्वारा कर रहे हैं।