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तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्॥१७॥

In Hindi:

पदपाठ : तद् उपरागापेक्षित्वात् चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्॥

हिंदी में अर्थ : (तद् उपरागापेक्षित्वात्) उस बाह्य वस्तु के उपराग की अपेक्षा वाला होने से (चित्तस्य) चित्त को (वस्तु) बाह्य पदार्थ = विषय (ज्ञाताज्ञातम्) कभी ज्ञात और कभी अज्ञात रहते हैं॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : अयस्कान्तमणिकल्पा विषया अयःसधर्मकं चित्तमभिसम्बन्ध्योपरञ्जयन्ति। येन च विषयेणोपरक्तं चित्तं स विषयो ज्ञातस्ततोऽन्यः पुनरज्ञातः। वस्तुनो ज्ञाताज्ञातस्वरूपत्वात्परिणामि चित्तम्॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (विषयाः) भौतिक विषय = पदार्थ (अयस्कान्तमणिकल्पाः) अयस्कान्त मणि = चुम्बक के समान होते हैं, और (अयःसधर्मकम्) लोह के समान धर्म वाले (चित्तम्) चित्त को, (अभिसम्बन्ध्य) अपने साथ सम्बन्धित करके (उपरञ्जयन्ति) उपरञ्जित कर देते हैं। (च) और (येन विषयेण) जिस विषय = पदार्थ से (चित्तम्) चित्त (उपरक्तम्) उपरक्त होता है, (सः) वह (विषयः) विषय = पदार्थ (ज्ञातः) चित्त को ज्ञात होता है, (पुनः) और (ततः) उस विषय से (अन्यः) अन्य विषय (अज्ञातः) अज्ञात होते हैं। (वस्तुनः) वस्तु के (ज्ञाताज्ञातस्वरूपत्वात्) ज्ञात और अज्ञात स्वरूप वाला होने से (चित्तम्) चित्त (परिणामि) परिणामी सिद्ध होता है॥

वैदिक वृत्ति : पिछले दो सूत्रों में पदार्थ की स्वतन्त्र सत्ता सिद्ध करके, उस विषय का उपसंहार करते हुए भाष्यकार महर्षि व्यास ने प्रतिपादित किया है कि स्वतन्त्र वस्तु और स्वतन्त्र चित्त के सम्बन्ध से पुरुष के चित्त में जो अनुभव = ज्ञान होता है, वह पुरुष का भोग कहलाता है। अतः चित्त, विषयों = पदार्थों को ग्रहण करने की सामर्थ्य वाला है; और पदार्थ आदि विषय, चित्त द्वारा ग्राह्य होते हैं। ऐसी अवस्था में विषयों के अनेक होने पर भी चित्त एक से अधिक अथवा सभी विषयों को एक साथ = एक ही काल में ग्रहण क्यों नहीं करता?

वस्तुतः न्यायदर्शन में महर्षि गौतम ने मन का यही लक्षण किया है — “युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्॥” न्याय० १.१.१६॥ अर्थात् एक काल में अनेक ज्ञानों का उत्पन्न न होना मन का लक्षण हैं। यहाँ इस सूत्र में महर्षि पतञ्जलि उस प्रक्रिया को स्पष्ट कर रहे हैं, जिसके कारण चित्त में एक काल में एक ही वस्तु ज्ञात रहती है। वे कहते हैं कि बाह्य विषय = पदार्थ के उपराग की अपेक्षा वाला होने से, चित्त में बाह्य विषय = पदार्थ ज्ञात और अज्ञात रहते हैं।

बाह्य पदार्थ को चुम्बक के समान कहा है, अर्थात् ये पदार्थ अपने आकर्षण गुण के साथ विद्यमान रहते हैं, परन्तु फिर भी ग्राह्य होते हैं। इनके ज्ञान हेतु चित्त रूपी साधन की अपेक्षा रहती है, जो इन पदार्थों को ग्रहण करता है, जिसे महर्षि व्यास ने इस सन्दर्भ में लोह के समान कहा है। चुम्बक और लोह के अनुसार, चुम्बक लोहे में सञ्चार उत्पन्न करती हुई, लोहे के साथ सम्बद्ध हो जाती है। यहाँ बाह्य विषय, इन्द्रिय रूपी प्रणाली द्वारा सम्बद्ध होते हुए, चित्त का उपरञ्जित कर देते हैं अर्थात् चित्त को अपने स्वरूप के समान तदाकार कर देते हैं। इस रहस्य को महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र १.४१ में कहा है — जिसमें चित्त की स्फटिकमणि से तुलना की गई है। इस काल में चित्त अपने समीप प्राप्त हुए विषयों से प्रतिबिम्बित हुआ, उनके साथ तदाकारकारित हुआ, उनके स्वरूप के समान अर्थात् उनके आकार वाला होकर भासता है। यही चित्त का विषय के साथ उपरक्त होना है। और यही अवस्था चित्त में विषय के ज्ञात होने की है। इस प्रकार से किसी एक विषय से तदाकारकारित हुए चित्त में अन्य विषय अज्ञात रहते हैं। क्योंकि चित्त एक काल में एक से अधिक पदार्थों से सम्बन्धित होकर तदाकारकारित नहीं हो सकता, अतः उपरक्त हुए विषय = पदार्थ से, भिन्न विषयों = पदार्थों का, उस काल में, चित्त के साथ सम्बन्ध सम्भव न होने से, चित्त उन विषयों = पदार्थों को ग्रहण नहीं कर सकता। यहाँ यह जानना चाहिए कि जिस पदार्थ = विषय द्वारा चित्त उपरक्त = तदाकारकारित होता है, वह पदार्थ और उसका ज्ञान, व्यवहार की योग्यता को प्राप्त करता हुआ, चित्त में ज्ञात होता है; और उस काल में उस पदार्थ से भिन्न अन्य सभी विषय = पदार्थ चित्त में अज्ञात रहते हैं।

वस्तुतः चित्त, जड़ प्रकृति का त्रिगुणात्मक परिणाम होने से, इसमें ज्ञान गुण नहीं घटता। क्योंकि ज्ञान गुण पुरुष = चेतन आत्मा का है, वह ही विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है। यहाँ पर चित्त में विषयों के ज्ञात और अज्ञात होने का अभिप्राय यह है कि जो विषय चित्त को जिस काल में उपरक्त करता है, वह विषय ज्ञात कहा जाता है; और उससे भिन्न अन्य सभी विषय अज्ञात कहाते हैं। चित्त की इसी योग्यता के कारण ही, चित्त में एकाग्रता और निरुद्धता का सम्पादन सम्भव होता है। यदि चित्त में एक काल में सभी विषय एक साथ ज्ञात रहते तो, इस स्थिति में चित्त न तो कभी एकाग्र हो सकता और ना ही निरुद्ध हो सकता, और परिणामस्वरूप योग = सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधियों की प्राप्ति ही सम्भव न हो पाती। अतः चित्त को लगातार एक विषय से उपरक्त रखने के अभ्यास से एकाग्रावस्था की प्राप्ति सम्भव होती है, और परिणामस्वरूप सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार चित्त में विषयों के किसी भी प्रकार से आलम्बन को सर्वथा रोकने से अर्थात् किसी भी विषय = पदार्थ से उपरक्त न होने देने के सम्यक् अभ्यास से निरुद्धावस्था की प्राप्ति सम्भव होती है, और परिणामस्वरूप असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है।

भोज ने इस सूत्र के भाष्य में चित्त में पदार्थों के ज्ञात और अज्ञात होने के द्वारा स्मृति के भी ज्ञात और अज्ञात होने को कहा है। जिस किसी पूर्व अनुभव किये गये पदार्थ में समानता आदि के कारण से, पदार्थ उस पूर्व अनुभूति के संस्कार को उद्बुद्ध करता है, चित्त में उस पदार्थ विषयक स्मृति उत्पन्न हो जाती है, और अन्य विषयक स्मृति नहीं होती।

चित्त में विषयों के कभी ज्ञात और कभी अज्ञात रहने से, चित्त को परिणामी कहा गया है। चित्त, विभिन्न कालों में, विभिन्न विषयों से उपरक्त होता हुआ = अर्थात् पृथक्-पृथक् विषय = पदार्थ के स्वरूप के आकार वाला होकर भासने से, परिणाम को प्राप्त होता हुआ, परिणामी कहा जाता है। अतः चित्त परिणामी होने से, विभिन्न कालों में, विभिन्न पदार्थों से तदाकारकारित होता रहता है।