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सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात्॥१८॥

In Hindi:

पदपाठ : सदा ज्ञाताः चित्तवृत्तयः तत्प्रभोः पुरुषस्य अपरिणामित्वात्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : यस्य तु तदेव चित्तं विषयस्तस्य—

भूमिका हिंदी अर्थ : (यस्य तु) जिस चेतन पुरुष का (तत् चित्तम्) वह विषयाकार चित्त (एव) ही (विषयः) विषय है (तस्य) उस पुरुष को—

हिंदी में अर्थ : (तत्प्रभोः) उस विषयाकार चित्त के प्रभु = स्वामी (पुरुषस्य) पुरुष = जीवात्मा को, (अपरिणामित्वात्) अपरिणामी होने से, (चित्तवृत्तयः) चित्त की वृत्तियाँ (सदा) सदा (ज्ञाताः) ज्ञात रहती हैं ॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : यदि चित्तवत्प्रभुरपि पुरुषः परिणमेत्ततस्तद्विषयाश्चित्तवृत्तयः शब्दादिविषयवज्ज्ञाताज्ञाताः स्युः। सदाज्ञातत्वं तु मनसस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वमनुमापयति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (यदि) यदि (चित्तवत्) चित्त के समान (प्रभुः) उसका स्वामी (पुरुषः) पुरुष = चेतन जीवात्मा (अपि) भी (परिणमेत्) परिणाम को प्राप्त होने वाला होवे (ततः) तो (तद्विषयाः) उस पुरुष के विषय (चित्तवृत्तयः) चित्त की वृत्तियाँ, (शब्दादिविषयवत्) शब्दादि विषयों के समान, (ज्ञाताज्ञाताः) कभी ज्ञात और कभी अज्ञात (स्युः) हो जायें। (मनसः) चित्त का = चित्त की वृत्तियों का (तु) तो (सदाज्ञातत्वम्) पुरुष को सदा ज्ञात रहना, (तत्प्रभोः) उस चित्त के स्वामी (पुरुषस्य) पुरुष का (अपरिणामित्वम्) अपरिणामी होना (अनुमापयति) अनुमान से सिद्ध होता है॥

वैदिक वृत्ति : पिछले सूत्र में चित्त को विषयों का ज्ञाता-अज्ञाता कहा है, अर्थात् जो विषय जिस काल में चित्त को उपरक्त = तदाकार करता है, वह विषय चित्त के लिए ज्ञात कहाता है; और अन्य सभी विषय उस काल में अज्ञात रहते हैं। इसके लिए विषयों को अयस्कान्तमणि और चित्त को लोह कहा गया है। इन्द्रिय और अर्थ = पदार्थ के सन्निकर्ष से समीप प्राप्त हुए पदार्थ = विषय से उपरक्त होने वाला = तदाकार होने वाला चित्त, परिणामी कहलाता है क्योंकि वह भिन्न-भिन्न कालों में भिन्न-भिन्न विषयों से तदाकारकारित होकर, उनके समान रूप वाला होकर, भासता है। यहाँ इस सूत्र में चित्तवृत्तियों और पुरुष के सम्बन्ध में कहा जा रहा है कि चित्तवृत्तियाँ पुरुष को सदा ज्ञात होती हैं, क्योंकि पुरुष परिणामी नहीं है।

इस सूत्र की अवतरणिका में भोज ने शंका उठाई है कि जिस प्रकार चित्त वस्तु का ज्ञाता और अज्ञाता होता है, इसी प्रकार से पुरुष भी चित्त में उपस्थित हुए विषयों का द्रष्टा होता हुआ, जिस काल में चित्त में उपस्थित नीले वर्ण को जानता है, उस काल में पीले वर्ण को नहीं जानता, इसलिये पुरुष भी ग्रहीता होता हुआ कभी विषय को जानता और कभी नहीं जानता, इसप्रकार पुरुष भी चित्त के समान परिणामी हो जाये।

पूर्व सूत्र की व्याख्या में यह स्पष्ट किया गया है कि ज्ञान गुण पुरुष का है, अतः वह प्रकृति के विकार त्रिगुणात्मक जड़ चित्त में नहीं घटता, अर्थात् चित्त उपरक्त हुए विषय का वास्तविक ज्ञाता नहीं होता। अतः केवल मात्र उपरक्तता के कारण ही, विषयों को चित्त में ज्ञात अथवा अज्ञात कहा जाता है। जबकि दूसरी ओर पुरुष = आत्मा ज्ञानगुण वाला है, वह चित्त में उपस्थित होने वाले सभी विषयों का यथार्थ ज्ञाता है। अर्थात् जिस काल में चित्त नीले रंग से उपरक्त होता है, उस काल में पुरुष = आत्मा उस नीले रंग को भी जानता है, तथा यह भी जानता है कि यह रंग पीला या लाल आदि नहीं है, यह रंग दूसरे सभी रंगों से भिन्न नीला रंग है। यदि पुरुष = आत्मा को उस काल में पूर्व ज्ञात पीले / लाल आदि रंग का ज्ञान न हो तो वह उन रंगों से भिन्न इस नीले रंग की भिन्नता का बोध न कर सके। परन्तु उसके द्वारा, उस काल में, इस नीले रंग की अन्य रंगों से भिन्नता का ज्ञान, यह सिद्ध करता है कि चित्त में पूर्वकाल में उपस्थित हुए पीले, लाल आदि रंग भी, उसे ज्ञात है, अज्ञात नहीं हैं। अतः इसप्रकार से पुरुष = आत्मा को अपरिणामी होने के कारण, चित्त में उपस्थित हुए सभी विषय सदा ज्ञात रहते हैं। चित्त और पुरुष के इस अन्तर को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

१. विषय के इन्द्रियों के माध्यम से चित्त में प्राप्त होने पर, चित्त स्फटिकमणि के समान तदाकारकारित होता है; परन्तु चित्त में प्राप्त कोई भी विषय पुरुष को तदाकार = उपरक्त नहीं करता, और न ही चित्त की कोई वृत्ति पुरुष के स्वरूप में परिवर्तन करने में सक्षम होती है। अतः सभी वृत्तियाँ चित्त में ही होती, पुरुष में नहीं।

२. चित्त जड़ होने से, विषयों = पदार्थों का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। परन्तु चित्त जिस पदार्थ = विषय से उपरक्त = तदाकारकारित होता है, वही विषय चित्त के लिए ज्ञात कहाता है, और अन्य विषय अज्ञात कहाते हैं। दूसरी ओर पुरुष चित्त की वृत्तियों का ज्ञाता है और चित्त की सभी वृत्तियों को जानता है।

३. व्यवहार काल में विषय, चित्त के लिए चुम्बक के समान होते हुए, चित्त को उपरञ्जित करते हैं, दूसरी ओर पुरुष और चित्त के सम्बन्ध में, चित्त चुम्बक = अयस्कान्त मणि के समान समीप होने मात्र से ही पुरुष का उपकार करता हुआ, पुरुष रूपी स्वामी का धन हो जाता है। परन्तु जैसे चित्त स्फटिकमणि के समान होता हुआ, विषयों से स्वयं उपरक्त होता है, उसी प्रकार यह चित्त पुरुष को उपरञ्जित करने में समर्थ नहीं होता।

४. चित्त, प्रकृति का त्रिगुणात्मक परिणाम होता हुआ, विभिन्न क्षिप्तादि (= क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध) अवस्थाओं वाला होता है। चित्त की, किसी भी एक काल में, कोई भी एक अवस्था प्रधान रूप से ज्ञात रहती है। दूसरी ओर पुरुष, चित्त के सम्बन्ध से, चित्तवृत्तियों के स्वरूप का भासता है, चित्त की निरुद्धावस्था में वह अपने स्वरूप में स्थित होता है, परन्तु अन्य क्षिप्तादि अवस्थाओं में भी पुरुष अपरिणामी = अपने स्वरूप में होता हुआ भी, चित्त की वृत्तियों के समान रूपवाला ही ज्ञात होता है। इस अवस्था में पुरुष चित्त की सभी वृत्तियों का ज्ञाता रहता है, उसकी कोई भी वृत्ति पुरुष के लिए अज्ञात नहीं रहती।

इस रहस्य को योगसूत्र २.४ पर व्यासभाष्य से भी समझा जा सकता है। देखो, चित्त में राग क्लेश के उदार दशा में होने पर, पुरुष वृत्तिसारूप्य के कारण यह जानता है कि मैं अमुक विषय में रागयुक्त हूँ। उस काल में चित्त में उपस्थित द्वेष विच्छिन्न अवस्था में होता है। उस काल में, जबकि दूसरे विषय के प्रति, पुरुष के चित्त में द्वेष दबा हुआ है, परन्तु पुरुष को उस द्वेष की अवस्था का ज्ञान उस काल में भी रहता है। इसीप्रकार चित्त में किसी एक स्त्री के प्रति राग उदार अवस्था में होने पर, उस काल में अन्य स्त्रियों के प्रति राग विच्छिन्न अवस्था में होने पर भी, पुरुष को वर्त्तमान काल में उस स्त्री के प्रति राग के ज्ञान के साथ-साथ अन्य स्त्रियों के प्रति राग का ज्ञान रहता है। तथा पुरुष के चित्त में जिन आलम्बनों में द्वेष विच्छिन्न अवस्था वाला होता है, पुरुष को उन अन्य आलम्बनों में द्वेष का ज्ञान भी रहता है, यद्यपि चित्त में जब तक वे आलम्बन उपस्थित नहीं होगें तब तक द्वेष उदार अवस्था में नहीं आयेगा। यदि ऐसा न माना जाये तो जड़ चित्त में दूसरे रागवाले अथवा द्वेषवाले आलम्बन के उपस्थित होने पर ही राग अथवा द्वेष की प्रगटता किस प्रकार से सम्भव होगी, क्योंकि चित्त जड़ होने से, ऐसी प्रतिक्रिया का तत्काल ही स्वतः होना सम्भव नहीं हो सकता। इससे सिद्ध होता है िक पुरुष को राग और द्वेष के आलम्बनों का ज्ञान, पूर्व अनुभव के आधार पर है। अतः पुरुष को चित्त की सभी वृत्तियों का ज्ञात होना सिद्ध होता है।

यदि यहाँ पुरुष भी चित्त के समान परिणामी होता तो, उसे भी चित्त की सभी वृत्तियाँ एक साथ ज्ञात नहीं हो पाती; क्योंकि वह भी चित्त की जिस वृत्ति के साथ तदाकार होता, मात्र उसी वृत्ति को जानता, और उसे भी अन्य सभी वृत्तियाँ अज्ञात रहतीं। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है, इसीलिए महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.४ के भाष्य में कहा है कि “व्युत्थाने याश्चित्तवृत्तियस्तदविशिष्टवृत्तिः पुरुषः।” अर्थात् जैसे चित्त की वृत्ति होती है, उन्हीं वृत्तियों के समान धर्म वाला पुरुष होता है। पूरे योगदर्शन में महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने कहीं भी चित्तवृत्तियों से पुरुष का उपरक्त = तदाकार होना नहीं कहा। जबकि दूसरी ओर पुरुष को द्रष्टा अर्थात् त्रिगुणात्मक चित्त की सन्निधि से चित्त की वृत्तियों = विषयों को देखने वाला स्पष्ट रूप से कहा है। योगसूत्र २.२० की व्याख्या में महर्षि व्यास स्पष्ट रूप से कह रहे हैं — “ज्ञाताज्ञातविषयत्वात्परिणामिनी हि बुद्धिः। तस्याश्च विषयो गवादिर्घटादिर्वा ज्ञातश्चाज्ञातश्चेति परिणामित्वं दर्शयति। सदा ज्ञातविषयत्वं तु पुरुषस्यापरिणामित्वं परिदीपयति। कस्मात्। न हि बुद्विश्च नाम पुरुषविषयश्च स्यादगृहीता गृहीता चेति सिद्धं पुरुषस्य सदा ज्ञातविषयत्वं ततश्चापरिणामित्वमिति। अर्थात् बुद्धि ज्ञात और अज्ञात विषयों वाली होने से परिणामी कहाती है, और बुद्धि के विषय गौ और घट आदि कभी ज्ञात और कभी अज्ञात रहते हैं। परन्तु इसके विपरीत विषयों का सदा ज्ञात रहना, पुरुष के अपरिणामी रूप को सिद्ध करता है। कैसे ? क्योंकि पुरुष के ज्ञान की साधन बुद्धि, पुरुष को कभी ज्ञात हो और कभी अज्ञात हो, ऐसा नहीं हो सकता। इस कारण पुरुष का सदा ज्ञात विषय वाला होना सिद्ध होता है।” अतः बुद्धि = चित्त की सभी वृत्तियाँ, पुरुष के लिए, उसी रूप से सदा ज्ञात रहती हैं, और इसी कारण पुरुष अपरिणामी कहाता है।