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न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्॥१९॥

In Hindi:

पदपाठ : न तत् स्वाभासम् दृश्यत्वात्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : स्यादाशङ्का चित्तमेव स्वाभासं विषयाभासं च भविष्यतीत्यग्निवत् —

भूमिका हिंदी अर्थ : (स्यात् आशङ्का) इस विषय में यह शंका हो सकती है कि (चित्तम् एव) चित्त ही, (अग्निवत्) अग्नि के समान, (स्वाभासम्) अपना प्रकाशक (च) और (विषयाभासम्) विषय का भी प्रकाशक (भविष्यति इति) होगा—

हिंदी में अर्थ : (तत्) वह चित्त (दृश्यत्वात्) दृश्य = जड़ होने से (स्वाभासम्) अपना प्रकाशक (न) नहीं होता॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : यथेतराणीन्द्रियाणि शब्दादयश्च दृश्यत्वान्न स्वाभासानि तथा मनोऽपि प्रत्येतव्यम्। न चाग्निरत्र दृष्टान्तः। न ह्यग्निरात्मस्वरूपमप्रकाशं प्रकाशयति प्रकाशश्चायं प्रकाश्यप्रकाशकसंयोगे दृष्टः। न च स्वरूपमात्रेऽस्ति संयोगः। किं च स्वाभासं चित्तमित्यग्राह्यमेव कस्यचिदिति शब्दार्थः। तद्यथा—स्वात्मप्रतिष्ठमाकाशं न परप्रतिष्ठमित्यर्थः। स्वबुद्धिप्रचारप्रतिसंवेदनात्सत्त्वानां प्रवृत्तिर्दृश्यते — क्रुद्धोऽहं भीतोऽहममुत्र मे रागोऽमुत्र मे क्रोध इति। एतत्स्वबुद्धेरग्रहणे न युक्तमिति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (यथा) जैसे (इतराणि इन्द्रियाणि) दूसरी चक्षु आदि इन्द्रियाँ, (च) और (शब्दादयः) शब्दादि विषय (दृश्यत्वात्) दृश्य होने से (स्वाभासानि) स्वप्रकाशक (न) नहीं होते, (तथा) वैसे (मनः अपि) मन = चित्त भी स्वप्रकाशक नहीं है, (प्रत्येतव्यम्) ऐसा समझना चाहिए। (च) और (अत्र) इस विषय में (अग्निः दृष्टान्तः) अग्नि का दृष्टान्त (न) नहीं हो सकता। (हि) क्योंकि (अग्निः) अग्नि (अप्रकाशकम् आत्मस्वरूपम्) अपने अप्रकाशित रूप को (न प्रकाशयति) प्रकाशित नहीं करती। इस विषय में तर्क दिया है — (च) और (अयम् प्रकाशः) यह जो विषयों = पदार्थों का प्रकाशन होता है वह (प्रकाश्यप्रकाशकसंयोगे) प्रकाश्य = प्रकाश करने योग्य वस्तु और प्रकाशक के संयोग होने पर ही (दृष्टः) देखा जाता है; (स्वरूपमात्रे) वस्तु के केवल स्वरूपमात्र में (संयोगः न च अस्ति) प्रकाश्य और प्रकाशक का संयोग = एक साथ होना नहीं देखा जाता।

(किम् च) और यदि कोई कहे कि (चित्तम्) चित्त (स्वाभासम् इति) अपना प्रकाशक है, किन्तु (अग्राह्यम् एव कस्यचित्) किसी अन्य = चेतन पुरुष से ग्राह्य नहीं है — (इति शब्दार्थः) यह स्वाभासम् का अर्थ है, (तद् यथा) जैसे कि (स्वात्मप्रतिष्ठम् आकाशम्) आकाश अपने आप में प्रतिष्ठित है अर्थात् (न परप्रतिष्ठम्) किसी अन्य में प्रतिष्ठित नहीं है, (इति अर्थः) यह अर्थ है। इस पूर्व पक्ष में दोष दिखाते हैं — (सत्त्वानाम्) प्राणियों की (प्रवृत्तिः) कार्यों में प्रवृत्ति (स्वबुद्धिप्रचारप्रतिसंवेदनात्) अपनी चित्तवृत्तियों का प्रतिसंवेदन = ज्ञान होने पर (दृश्यते) देखी जाती है, जैसे कि (अहम् क्रुद्धः) मैं क्रुद्ध = क्रोधित हूँ, (अहम् भीतः) मैं भीत = डरा हुआ हूँ, (अमुत्र मे रागः) अमुक विषय में मेरा राग है, (अमुत्र मे क्रोधः) अमुक विषय में मेरा क्रोध है, (इति) इस प्रकार (एतत्) यह समस्त प्राणियों की प्रवृत्ति = व्यापार (स्वबुद्धेः अग्रहणे) अपने चित्त की वृत्तियों का संवेदन = ज्ञान न मानने पर (न युक्तम् इति) संभव नहीं है॥

वैदिक वृत्ति : पिछले सूत्र में पुरुष को वास्तविक ज्ञाता सिद्ध किया गया है। चित्त में विषय = पदार्थ के तदाकार होने पर विषय ज्ञात कहा जाता है, परन्तु उस तदाकार हुए विषय = पदार्थ को जानने वाला पुरुष ही होता है। इस विषय में चेतन पुरुष की सत्ता न मानने वाले यह शंका करते हैं कि जैसे अग्नि अन्य पदार्थों का प्रकाशक होने के साथ-साथ अपना भी प्रकाशक होता है, उसी प्रकार से चित्त को विषयों = पदार्थों के साथ-साथ अपने स्वरूप का भी प्रकाशक मानने से, चित्त ही अन्य पदार्थों एवं स्वयं को भी जानने वाला हो जायेगा और इससे व्यवहार की सिद्धि होने से, आत्मा = चेतन पुरुष की सत्ता को स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस शंका का समाधान करते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि वह चित्त दृश्य होने से अपना प्रकाशक नहीं होता।

दृश्य का स्वरूप, शास्त्रकार योगसूत्र २.१८ में स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जो सत्त्वादि गुण रूप, भूत और इन्द्रियों के रूप वाला, द्रष्टा के भोग और अपवर्ग का हेतु है, वह दृश्य कहाता है। चित्त भी दृश्य होने से द्रष्टा = आत्मा के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन को सिद्ध करने वाला, सत्त्वादि गुणों का जड़ परिणाम ही है। महर्षि व्यास इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि जैसे नेत्रादि अन्य इन्द्रियाँ और शब्दादि विषय दृश्य होने से अपना ज्ञान स्वयं नहीं कर सकते = ज्ञानस्वरूप नहीं होते, उसी प्रकार चित्त भी अपना प्रकाशक नहीं हो सकता। चित्त सत्त्वगुण की प्रबलता से विषयों का प्रकाशक तो होता है, परन्तु इस प्रकार से प्रकाशित हुए विषयों का ज्ञाता = द्रष्टा चेतन पुरुष ही होता है।

इस विषय में पूर्वपक्षी द्वारा अग्नि का दृष्टान्त दिया गया है। उसका निराकरण करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि इस विषय में अग्नि का दृष्टान्त उचित नहीं है। अग्नि भी पर-प्रकाशक के साथ स्व-प्रकाशक नहीं है, क्योंकि अग्नि भी अपने अप्रकाशित रूप को प्रकाशित नहीं करती। लोक में अग्नि भी नेत्र इन्द्रिय के सम्बन्ध से चित्त के द्वारा प्रकाशित होती है, स्वतः नहीं; यदि ऐसा न हो तो, नेत्रहीन व्यक्ति को भी अग्नि का रूप प्रत्यक्ष होना चाहिए। भाष्यकार इसमें हेतु देते हुए स्पष्ट करते हैं कि विषयों = पदार्थों का प्रकाशन भी, प्रकाश्य पदार्थ और प्रकाशक = चित्त के संयोग होने पर ही, द्रष्टा को होता है; और किसी भी एक दृश्य वस्तु = पदार्थ में प्रकाश्य और प्रकाशक का एक साथ होना सम्भव नहीं होता।

चित्त के स्वप्रकाशक होने में पूर्वपक्षी द्वारा यदि यह कहा जाये कि ‘‘स्वाभासम्’’ का अभिप्राय है कि चित्त अपना प्रकाशक है, किन्तु अन्य चेतन पुरुष द्वारा ग्रहण नहीं होता जैसे कि आकाश अपने आप में प्रतिष्ठित है, जिसका अर्थ है कि आकाश किसी अन्य में प्रतिष्ठित नहीं है; इसी प्रकार चित्त के स्वप्रकाशक होने का भी यही अभिप्राय है कि वह किसी अन्य द्वारा ग्रहीत नहीं होता। इस मान्यता का भी खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि प्राणीमात्र की कर्मों में प्रवृत्ति, चित्तवृत्तियों का ज्ञान होने पर ही देखी जाती है, अन्यथा नहीं। जैसे कि किसी भी पुरुष द्वारा यह व्यवहार कि “मैं अमुक व्यक्ति से क्रोधित हूँ; इस विषय = धन, सम्बन्धी आदि में मेरा राग है; अमुक प्राणी = मनुष्य आदि से मैं डरा हुआ हूँ”, इत्यादि प्रकार की प्रवृत्ति, अपने चित्त में उपस्थित हुए = आलम्बन को प्राप्त हुए विषय का ज्ञान न मानने से, द्रष्टा द्वारा सम्भव नहीं हो सकती। क्योंकि चित्त की वृत्तियों का प्रतिसंवेदन किये बिना प्राणियों में इस प्रकार की प्रवृत्ति हो ही नहीं सकती। अविद्यादि क्लेश और सभी वृत्तियाँ चित्त में ही रहती है, न कि चेतन पुरुष में। चित्त के अपने कारण प्रकृति में लीन होने पर अविद्यादि क्लेश और सभी प्रकार की वृत्तियाँ पुरुष के लिए न रहने से ही, वह स्वरूपस्थिति को प्राप्त करता = कैवल्य को प्राप्त होता है। अतः भोगकाल में चित्त और उसकी वृत्तियाँ, द्रष्टा = पुरुष द्वारा सदा ही ग्राह्य होती हैं, और तदनुकूल ही उसकी शुभाशुभ कर्मों में प्रवृत्ति देखी जाती है। अतः चित्त किसी भी प्रकार से, किसी भी तर्क से, स्वप्रकाशक सिद्ध नहीं होता।