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एकसमये चोभयानवधारणम् ॥२०॥

In Hindi:

पदपाठ : एकसमये च उभयानवधारणम्॥

हिंदी में अर्थ : (च) और (एकसमये) एक समय में (उभयानवधारणम्) उभय = चित्त और विषय दोनों का अवधारण = ज्ञान नहीं हो सकता॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : न चैकस्मिन् क्षणे स्वपररूपावधारणं युक्तं, क्षणिकवादिनो यद्भवनं सैव क्रिया तदेव च कारकमित्यभ्युपगमः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (च) और (एकस्मिन् क्षणे) एक ही क्षण में चित्त द्वारा (स्वपररूपावधारणम्) अपने स्वरूप का और विषय के स्वरूप का ग्रहण करना = ज्ञान करना (न युक्तम्) युक्त = सम्भव नहीं है। (क्षणिकवादिनः) क्षणिकवादी के मत में (यत्) जो (भवनम्) चित्त की उत्पत्ति है, (सा एव क्रिया) वह उत्पत्ति ही क्रिया है, (च) और (तदेव) चित्त का क्षणिक अस्तित्व ही (कारकम्) कारकता = कर्तृ-करण-कर्म रूपता है; (इति) यह (अभ्युपगमः) उनका स्वीकृत सिद्धान्त है॥

वैदिक वृत्ति : पिछले सूत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि चित्त दृश्य होने से अपना प्रकाशक नहीं होता। किन्तु चित्त में उपस्थित हुए विषय का वास्तविक द्रष्टा चेतन पुरुष होता है, और चित्त का सारा व्यापार इसी चेतन पुरुष के भोग और अपवर्ग के हेतु ही है। अतः चित्त में उपस्थित हुए विषयों के प्रतिसंवेदन के आधार पर, द्रष्टा पुरुष अपने हित को चाहता और अहित को दूर करने हेतु प्रयत्न करता है। यदि द्रष्टा चेतन पुरुष को स्वीकार न किया जाये, तो व्यवहार की असिद्धि का दूसरा तर्क देते हुए सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि एक ही काल में एक साथ चित्त और विषय दोनों का ग्रहण = ज्ञान नहीं हो सकता।

इस सूत्र की व्याख्या को दो मान्यताओं के सन्दर्भ में समझा जा सकता है, जो कि निम्न प्रकार से हैं —

१. चित्त स्थायी है, परन्तु उसका कोई द्रष्टा नहीं; अर्थात् चित्त ही अपना प्रकाशक है; और

२. चित्त क्षणिक है, हर क्षण नया चित्त उत्पन्न होता और नष्ट होता है; अर्थात् नया चित्त पूर्व चित्त का स्थान ले लेता है।

पहले मत का खण्डन भोज ने निम्न प्रकार से किया है — किसी भी पदार्थ = विषय का ज्ञान, व्यवहार हेतु होता है। यथा यह पदार्थ = विषय सुख का कारण है, अथवा दुःख का कारण है। इस प्रकार से (१) पदार्थ = विषय से सुख-दुःख का ज्ञान और तदानुकूल व्यवहार, तथा (२) चित्त द्वारा यह बोध कि “मैं इस विषय को जानने वाला हूँ”, रूप दो कार्य पदार्थ के प्रत्यक्ष काल में नहीं हो सकते — क्योंकि चित्त द्वारा एक काल में एक ही कार्य सम्भव होता है। महर्षि पतञ्जलि योगसूत्र ४.१७ में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित कर रहे हैं कि चित्त जिस काल में जिस विषय से उपरक्त होता है, वह विषय चित्त को ज्ञात होता है और अन्य विषय अज्ञात रहते हैं। अतः जिस काल में विषय का आलम्बन होने से चित्त में विषय ज्ञात होता है, उस काल में, दूसरा कार्य कि — यह विषय मेरे लिये सुख का अथवा दुःख का कारण है और तदनुकूल विषय के प्रति राग और द्वेष का व्यवहार नहीं हो सकता। और जिस काल में यह ज्ञान हो रहा है, उस काल में चित्त में विषय की उपरक्तता न होने से चित्त में विषय अज्ञात हो जाता है। अतः विषय के अज्ञात काल में उस विषय से सुख-दुःख का ज्ञान जड़ चित्त में सम्भव नहीं है। इसलिये चित्त द्वारा अपना और विषय दोनों का ज्ञान एक साथ सम्भव नहीं होता। अतः चित्त स्वप्रकाशक नही होता।

महर्षि व्यास ने इस सूत्र की व्याख्या में क्षणिकवादियों की मान्यता का निराकरण किया है। वे कहते हैं कि क्षणिकवादी यह मानते हैं कि चित्त क्षणिक है। अतः क्षणिक चित्त एक समय में अपना और विषय दोनों का ज्ञान कराये, यह सम्भव नहीं है। क्योंकि चित्त एक क्षण में उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है, दूसरे क्षण में दूसरा चित्त और उसके अगले क्षण में अन्य चित्त। इस प्रकार चित्त की प्रथम क्षण में उत्पत्ति होना ही एक मात्र क्रिया है और उत्पत्ति के क्षण में वह चित्त अन्य विषय का ज्ञान प्राप्त कर ले यह सम्भव नहीं हो सकता; और दूसरे क्षण में वह चित्त ही नहीं होता और दूसरे क्षण में विषय का आलम्बन करने हेतु पहले क्षण वाला चित्त ही उपस्थित नहीं होता। किसी भी पदार्थ के ज्ञान का सिद्धान्त इस प्रकार से है कि प्रथम क्षण में वस्तु की उत्पत्ति, दूसरे क्षण में उसकी क्रिया और तृतीय क्षण में किसी कार्य को करने से वह पदार्थ कारक कहाता है। परन्तु ये तीनों कार्य उत्पत्ति, क्रिया और कारक का एक क्षण में होना सम्भव नहीं होता। अतः क्षणिक चित्त में कारकता का होना सम्भव न होने से चित्त का स्वप्रकाशक होना युक्त नहीं जानना चाहिए। क्षणिकवादियों की मान्यता का खण्डन महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.३२ की व्याख्या में भी किया है।