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तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्॥२६॥

In Hindi:

पदपाठ : तदा विवेकनिम्नम् कैवल्यप्राग्भारम् चित्तम्॥

हिंदी में अर्थ : (तदा) उस विवेकज्ञान के होने पर (चित्तम्) योगी का चित्त (विवेकनिम्नम्) विवेकमार्ग पर चलने वाला और (कैवल्यप्राग्भारम्) मोक्षाभिमुख = मोक्ष की ओर जाने वाला हो जाता है।

महर्षि दयानन्द व्याख्या : “(तदा विवेक०) जब सब दोषों से अलग होके ज्ञान की ओर आत्मा झुकता है, तब कैवल्य - मोक्षधर्म के संस्कार से चित्त परिपूर्ण हो जाता है, तभी जीव को मोक्षप्राप्त होता है। क्योंकि जब तक बन्धन के कामों में जीव फँसता जाता है, तब तक उसको मुक्ति प्राप्त होना असम्भव है।” (ऋ० भू॰ मुक्तिविषय)

प्राचीन ॠषि भाष्य : तदानीं यदस्य चित्तं विषयप्राग्भारमज्ञाननिम्नमासीत्तदस्यान्यथा भवति कैवल्यप्राग्भारं विवेकजज्ञाननिम्नमिति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (तदानीम्) तब = विवेकज्ञान के होने पर, (अस्य) इस योगी का (यत्) जो (चित्तम्) चित्त, पहले (विषयप्राग्भारम्) सांसारिक विषयों की ओर बहने वाला, तथा (अज्ञाननिम्नम्) अज्ञान मार्ग पर चलने वाला (आसीत्) था, (अस्य) इस योगी का (तत्) वह चित्त (अन्यथा) पूर्व की स्थिति से अन्य = भिन्न = विपरीत (भवति) हो जाता है अर्थात् (कैवल्यप्राग्भारम्) कैवल्य = मोक्षमार्ग की ओर बहने वाला, और (विवेकजज्ञाननिम्नम् इति) विवेकख्याति के मार्ग पर चलने वाला हो जाता है॥

वैदिक वृत्ति : योगसूत्र १.१२ की व्याख्या में महर्षि व्यास कहते हैं कि चित्त रूपी नदी दो ओर बहने वाली है। जो धारा मोक्ष की ओर उन्मुख होकर विवेकख्याति के मार्ग पर बहती है, वह कल्याण को प्राप्त कराती है; और जो धारा सांसारिक विषय भोगों की ओर उन्मुख होकर अज्ञानमार्ग पर बहती है, वह पाप मार्ग पर बहती है। साधारण मनुष्य की चित्तवृत्तियों की धारा इसी दूसरे मार्ग = अज्ञान मार्ग पर ही बहती है। उस सूत्र की व्याख्या में कल्याणमार्ग की धारा का प्रवाह खोलने का उपाय बताते हुए कहा है — “विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्त्रोत उद्घाट्य।” अर्थात् विवेकज्ञान = प्रकृति पुरुष के भेदज्ञान के अभ्यास द्वारा मोक्षपथ की ओर जाने वाले प्रवाह को खोला जाता है।

योगी द्वारा अब अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में चित्त और पुरुष के भेदज्ञान का साक्षात् करने से, वह अपनी आत्मभावभावना = आत्मविषयक जिज्ञासाओं को निवृत्त करता है। इस अवस्था में उसके लिये अपना कर्त्तव्यपथ तथा परम पुरुषार्थ कैवल्य स्पष्ट रूप से भासित हो रहा होता है। अब तक साधक का जो चित्त सांसारिक विषयों को उद्देश्य बना कर अविद्या = अज्ञान के पथ पर चल रहा था, वही चित्त अब सत्त्व- पुरुषान्यताख्याति के बल पर अपने पूर्व पथ से सर्वथा भिन्न पथ पर अर्थात् मोक्ष की ओर उन्मुख हुआ विवेकमार्ग पर चलने लगता है।

यहाँ यह जानना चाहिए कि अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में पुरुष-साक्षात्कार की इस अवस्था से पूर्व की अवस्था तक योगी के चित्त का प्रवाह संसाराभिमुख ही रहता है। चाहे साधक को शाब्दिक ज्ञान द्वारा प्रकृति की अपेक्षा से पुरुष की श्रेष्ठता ज्ञात हो जाती है, परन्तु विवेकख्याति के अभाव में चित्त की कल्याणपथ की धारा चालू नहीं हो पाती। इस विषयक शाब्दिकज्ञान से उस कल्याणवाहिनी धारा की ओर प्रवाहित होने की प्रेरणा ही योगी को इस स्थिति में लाने का आधार बनती है। इसप्रकार से इस अवस्था में चित्त से सर्वथा भिन्न स्वरूपतः शुद्ध चेतन पुरुष का ज्ञान प्राप्त होने से, योगी का चित्त उस कैवल्यपथ की ओर अग्रसर हुआ विवेकमार्ग की ओर बहने लगता है; अर्थात् अब योगी के चित्त की वृत्तियाँ विवेकख्याति के प्रभाव से मोक्षाभिमुख हो जाती है। चित्त की इसी स्थिति को कैवल्यप्राग्भार कहा है।