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तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः॥२७॥

In Hindi:

पदपाठ : तत् छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणिः संस्कारेभ्यः॥

हिंदी में अर्थ : (तत् छिद्रेषु) उस विवेकज्ञान प्रवाह के छिद्रों में = विवेकज्ञान प्रवाह के बीच-बीच में (संस्कारेभ्यः) पूर्व के व्युत्थान संस्कारों से (प्रत्ययान्तराणिः) विवेकख्याति रूप ज्ञान से भिन्न ज्ञान = सांसारिक प्रतीतियाँ उत्पन्न होती रहती हैं॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : प्रत्ययविवेकनिम्नस्य सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रप्रवाहारोहिणश्चित्तस्य तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराण्यस्मीति वा ममेति वा जानामीति वा न जानामीति वा। कुतः? क्षीयमाणबीजेभ्यः पूर्वसंस्कारेभ्य इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (प्रत्ययविवेकनिम्नस्य) विवेकज्ञान के मार्ग पर चलने वाले अर्थात् (सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्र- प्रवाहारोहिणः) सत्त्वपुरुषान्यताख्याति = चित्त और पुरुष के भेदज्ञान रूप प्रवाह में बहने वाले (चित्तस्य) चित्त के (तत् छिद्रेषु) ज्ञान प्रवाह के बीच-बीच में (प्रत्ययान्तराणि) विवेकख्याति से भिन्न ज्ञान भी उदित होते रहते हैं, जैसे (अस्मि इति वा) “मैं हूँ” अथवा (मम इति वा) “मेरा है” अथवा (जानामि इति वा) “मैं जानता हूँ” अथवा (न जानामि इति वा) “मैं नहीं जानता हूँ” इस प्रकार का ज्ञान उत्पन्न होता रहता है।

(कुतः) ऐसा क्यों होता है ? (क्षीयमाणबीजेभ्यः) क्षीण हुए बीजों वाले (पूर्वसंस्कारेभ्यः) पूर्व = पहले के संस्कारों के अस्तित्व में होने के कारण (इति) ऐसे अन्य ज्ञान उत्पन्न होते रहते हैं॥

वैदिक वृत्ति : अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में चित्त के चेतन पुरुष के आलम्बन से तदाकारकारित होने से योगी को, जड़, परिणामी चित्त से सर्वथा विपरीत चेतन, अपरिणामी पुरुष का साक्षात् होता है; और इस प्रकार सत्त्व और पुरुष के भेदज्ञान का साक्षात् करने वाले योगी का जो चित्त अभी तक संसाराभिमुख होता हुआ अविद्या = अज्ञान के पथ पर बह रहा था, वही चित्त अव कैवल्याभिमुख होकर विवेकख्याति = सत्त्वपुरुषान्यताख्याति के मार्ग पर बहना आरम्भ कर देता है। इस प्रकार से योगी के चित्त में विवेकख्याति विषयक वृत्तियों के उदय होने से वैसे-वैसे नये-नये संस्कार बनते हैं और उन वृत्तियों का प्रवाह चालू हो जाता है। इस समानविषयक प्रवाह के सम्बन्ध में महर्षि व्यास योगसूत्र ३.१२ की व्याख्या में लिखते हैं — “समाहितचित्तस्य पूर्वप्रत्ययः शान्तः उत्तरस्तत्सदृश उदितः।” अर्थात् समाहित हुए चित्त का पूर्व ज्ञान शान्त होता और उसके पश्चात् उसी ज्ञान के समान ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। इस स्थिति को शास्त्रकार ने चित्त का एकाग्रता परिणाम कहा है। इसप्रकार से समान ज्ञानों के शान्त और उदय होते रहने से चित्त में सत्त्वपुरुषान्यताख्याति विषयक ज्ञान का प्रवाह चालू रहता है। यह चित्त की विवेकख्याति विषयक एकाग्रता कही जाती है। परन्तु विवेकख्याति का यह प्रवाह “सर्वथा विवेकख्याति” की अवस्था नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति होती है। और न ही योगी की अभी तक क्लेश और कर्मों से निवृत्ति ही हुई है, क्योंकि यह अवस्था धर्ममेघ समाधि के उपरान्त ही प्राप्त होती है।

उस योगी के चित्त में अभी तक, क्लेश क्षीण होकर भी उपस्थित हैं; उसके शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्म और उन कर्मों के संस्कार भी उपस्थित हैं। उस चित्त में जन्म-जन्मान्तर के संचित संस्कार चित्रित हैं। ऐसी स्थिति में चित्त में जो विवेकख्याति विषयक प्रवाह बन गया था, उस प्रवाह के बीच-बीच में व्युत्थान संस्कारों के कारण विवेकख्याति से भिन्न = विपरीत ज्ञान भी उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसे भिन्न ज्ञानों के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए भाष्यकार महर्षि व्यास कहते हैं कि योगी के चित्त में —

१. “ मैं हूँ ” अर्थात् मैं इस प्रकार के शरीर वाला, अमुक नाम वाला पुरुष हूँ। यह स्थिति मुख्यता शरीर, इन्द्रिय विषयक मिथ्याज्ञान के कारण होती है;

२. “ मेरा हैं ” अर्थात् मैं अमुक-अमुक पदार्थों का स्वामी हूँ, अमुक-अमुक व्यक्ति मेरा परिवार, मेरे मित्र, मेरे सम्बन्धी - पुत्रादि हैं, अमुक-अमुक मेरे सेवक हैं, अमुक-अमुक धन-पदार्थ एवं पशु आदि मेरी सम्पत्ति है — मेरे अधिकार में हैं। यह स्थिति मुख्यतया अविद्या और राग क्लेश की प्रधानता को दर्शाती है;

३. “ मैं जानता हूँ ” अर्थात् मैं अमुक-अमुक विषयों का ज्ञाता हूँ, मेरा ऐसा-ऐसा ज्ञान है, जो अन्य पुरुषों की अपेक्षा से श्रेष्ठ है; और

४. “ मैं नहीं जानता हूँ ” अर्थात् मैं इन विषयों को नहीं जानता हूँ, इन-इन विषयों में मैं अन्यों की अपेक्षा कम ज्ञान वाला हूँ। इन दोनों ही स्थितियों में पुरुष चित्त में उपस्थित विषय, लोक सम्बन्धी ज्ञान को आत्मा में आरोपित करता है। यह स्थिति मुख्यतया अविद्या और अस्मिता क्लेश की प्रधानता को दर्शाती है।

इस प्रकार से व्युत्थानविषयक ज्ञान के उत्पन्न होने से योगी के चित्त में सत्त्वपुरुषान्यताख्याति का प्रवाह भंग हो जाता है। योगी के लिये इस अवस्था में उपर्युक्त प्रकार के अन्तराय = विघ्न उपस्थित होते रहते हैं, जो कि पूर्णरूपेण विवेकख्याति की प्राप्ति में बाधक बन जाते हैं। अतः योगी को इस विषय में अत्यन्त सचेत रहना चाहिए। इन अन्तरायों = विघ्नों के नाश का उपाय अगले सूत्र में कहा जा रहा है।