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हानमेषां क्लेशवदुक्तम्॥२८॥

In Hindi:

पदपाठ : हानम् एषाम् क्लेशवत् उक्तम्॥

हिंदी में अर्थ : (एषाम्) विभिन्न ज्ञानों को उत्पन्न करने वाले इन व्युत्थान संस्कारों का (हानम्) नाश भी (क्लेशवत्) अविद्यादि क्लेशों के नाश के समान (उक्तम्) कहा गया है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : यथा क्लेशा दग्धबीजभावा न प्ररोहसमर्था भवन्ति तथा ज्ञानाग्निना दग्धबीजभावः पूर्वसंस्कारो न प्रत्ययप्रसूर्भवति। ज्ञानसंस्कारास्तु चित्ताधिकारसमाप्तिमनुशेरत इति न चिन्त्यन्ते॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (यथा) जिस प्रकार (क्लेशाः) अविद्यादि क्लेश (दग्धबीजभावाः) दग्धबीजभाव को प्राप्त होकर (प्ररोहसमर्थाः) पुनः उगने = अपने कार्य करने में समर्थ (न भवन्ति) नहीं होते; (तथा) उसी प्रकार (ज्ञानाग्निना) विवेकख्याति रूपी ज्ञानाग्नि से (दग्धबीजभावः) दग्धबीज = जले हुए बीज रूप वाला होकर (पूर्वसंस्कारः) पूर्व के व्युत्थान काल का संस्कार (प्रत्ययप्रसूः) व्युत्थान काल के ज्ञान को उत्पन्न करने वाला (न भवति) नहीं होता।

(ज्ञानसंस्काराः) विवेकख्याति ज्ञानविषयक संस्कार (तु) तो (चित्ताधिकारसमाप्तिम्) चित्त के अधिकार की समाप्ति = अपवर्ग के सम्पादन पर्यन्त (अनुशेरते) पड़े रहते हैं = उपस्थित रहते हैं; (इति) इसलिये (न चिन्त्यन्ते) उनके विनाश के उपाय की चिन्ता नहीं की जाती॥

वैदिक वृत्ति : विवेकख्याति विषयक प्रवाह के मध्य उत्पन्न होने वाले विभिन्न ज्ञानों का कारण पूर्व अवस्था = व्युत्थान काल के संस्कार कहे गये हैं। विवेकख्याति की परिपक्वावस्था की प्राप्ति हेतु, इस प्रवाह के बीच में उत्पन्न होने वाले ज्ञानों का निरोध करना परमावश्यक है। इस विवेकख्याति विषयक ज्ञान से विपरीत ज्ञानों की निवृत्ति हेतु, चित्त में उपस्थित हुए उन व्युत्थान काल की वृत्तियों से उत्पन्न संस्कारों का नाश करना ही एकमात्र उपाय है।

महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि इन व्युत्थान कालीन संस्कारों का नाश भी अविद्यादि क्लेशों के नाश के समान ही होता है। अर्थात् जिस प्रकार साधक ने, अविद्यादि पाँचों क्लेशों को नष्ट करने हेतु, जिन उपायों को अपनाया था, उन्हीं उपायों से इन व्युत्थान कालीन संस्कारों का भी नाश करना चाहिए। अविद्यादि क्लेशों के नाश के उपायों को शास्त्रकार ने निम्न प्रकार से कहा है —

१. तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान रूप क्रियायोग के अनुष्ठान से अविद्यादि क्लेशों को तनु = निर्बल किया जाता है। (योगसूत्र २.१-२)

२. निर्बल हुए अविद्यादि क्लेशों को ध्यान रूपी अग्नि = प्रसंख्यानाग्नि = विवेकख्याति से नष्ट किया जाता है। (योगसूत्र २.१०-११)

३. योग के आठ अङ्गों का अनुष्ठान — इससे अविद्या रूपी अशुद्धि का क्षय और विवेकख्याति की प्राप्ति होती है। (योगसूत्र २.२८)

४. अभ्याय और वैराग्य के अनुष्ठान से सर्ववृत्तिनिरोध का होना। (योगसूत्र १.१२)

५. ईश्वरप्रणिधान (योगसूत्र १.२३), प्रणवजप और उसके अर्थ की भावना करना। (योगसूत्र १.२८)

६. ईश्वर रूपी एक तत्त्व के अभ्यास से विघ्नों = अन्तरायों का नाश करना। (योगसूत्र १.३२)

इन उपायों के सम्यक् अनुष्ठान से जिस प्रकार अविद्यादि क्लेशों का नाश होता है, उसी प्रकार इन्हीं उपायों के अनुष्ठान से व्युत्थान संस्कारों का भी नाश होता है। यहाँ साधक को ध्यान रखना चाहिए कि उपर्युक्त कुछ उपाय आरम्भिक अवस्था के हैं, फिर भी उनके सम्यक् अनुष्ठान का त्याग, यह सोचकर नहीं करना चाहिए कि “ मैं अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में पहुँच कर विवेकख्याति को प्राप्त कर चुका हूँ, मात्र इसी स्थिति को दृढ करने हेुत ही उपाय करना शेष है।” ऐसे चिन्तन से व्युत्थान संस्कार दग्धबीजभाव को प्राप्त नहीं होंगे, और योगी के लिये आगे की प्रगति सम्भव नहीं हो पायेगी; अर्थात् “सर्वथा विवेकख्याति” के अभाव में “धर्ममेघ समाधि” की प्राप्ति नहीं हो पायेगी।

विवेकख्याति के प्रवाह काल में सांसारिक भोगों के संस्कार, उनकी स्मृति और उस विषयक वृत्तियाँ योगी के लिये प्रबल विघ्न के रूप में उपस्थित होते हैं। इनका मूल कारण भी अविद्या ही है। इसी कारण महर्षि पतञ्जलि ने इन संस्कारों के नाश हेतु अविद्या नाश के सभी उपायों को कहा है। यहाँ यह जानना चाहिए कि विवेकज्ञान प्रवाह रूपी एकाग्रावस्था में व्यवधान का उपस्थित होना = समाधि अवस्था में उस विवेकख्याति रूप ज्ञान से भिन्न ज्ञान के उत्पन्न होने में, पूर्व के प्रबल संस्कार और उन संस्कारों के भी मूल में अविद्यादि क्लेश ही कारण होते हैं। अतः इन उपायों का अनुष्ठान करते हुए जब योगी, चित्त की विवेकख्याति विषयक एकाग्रता हेतु पुरुषार्थरत होता है, तो उस समाधि की अवस्था में जो संस्कार उत्पन्न होते हैं, वे संस्कार ही धीरे-धीरे संचित होते हुए प्रबल हो जाते हैं। और यही समाधिप्रज्ञा = विवेकख्यातिविषयक संस्कार ही व्युत्थान कालीन संस्कारों को बाधित करते हैं। देखो योगसूत्र १.५० की व्याख्या में महर्षि व्यास कहते हैं —

समाधिप्रज्ञाप्रभवः संस्कारो व्युत्थानसंस्काराशयं बाधते। व्युत्थानसंस्काराभिभवात्तत्प्रभवाः प्रत्यया न भवन्ति प्रत्ययनिरोधे समाधिरुपतिष्ठते। ततः समाधिजा प्रज्ञा, ततः प्रज्ञाकृताः संस्कारा इति नवो नवः संस्काराशयो जायते। ततश्च प्रज्ञा ततश्च संस्कारा इति।

अर्थात् समाधिप्रज्ञा से उत्पन्न संस्कार व्युत्थान संस्कारों और उनके आशय = वासनाओं को बाधित करते हैं। व्युत्थान संस्कारों के अभिभूत होने से = दबने से, उन संस्कारों से उत्पन्न होने वाली प्रतीतियाँ = वृत्तियाँ उत्पन्न नहीं होती। उन प्रत्ययों = ज्ञानों के निरोध होने पर समाधि उपस्थित रहती है। उस समाधि के बने रहने से समाधिजन्य प्रज्ञा = ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त होती है। उस समाधिजन्य प्रज्ञा से प्रज्ञाजन्य संस्कार बनते हैं। इस प्रकार नए-नए संस्कारों का आशय = समूह उत्पन्न होता है। और उन समाधि संस्कारों से समाधिप्रज्ञा और समाधिप्रज्ञा से समाधिसंस्कार उत्पन्न होते रहते हैं।

अतः योगी अविद्यानाश सम्बन्धी सभी उपायों को अपनाता हुआ, व्युत्थान संस्कारों को भी क्षीण करता है, और उसके परिणामस्वरूप विवेकख्याति रूपी एकाग्रता की स्थिति दृढ होती जाती है। इस प्रकार विवेकख्याति जन्य नये-नये संस्कारों के बनते रहने से व्युत्थान संस्कार धीरे-धीरे दुर्बल होकर, अन्ततः विवेकख्याति रूप ज्ञानाग्नि से, दग्धबीजभाव को प्राप्त हो जाते हैं।

साधक को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस अवस्था में अविद्यादि क्लेश और व्युत्थान संस्कार पूर्णतया दग्धबीजभाव की अवस्था में नहीं आते; क्योंकि महर्षि पतञ्जलि ने धर्ममेघ समाधि के उपरान्त ही क्लेश और कर्मों की निवृत्ति मानी है, और व्युत्थान संस्कारों की निवृत्ति इसके उपरान्त होती है।

महर्षि व्यास यहाँ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि विवेकख्याति विषयक संस्कार चित्त के अधिकार को = भोग सम्पादन को समर्थ नहीं करते, किन्तु जब तक पुरुष को अपवर्ग की प्राप्ति नहीं होती, तब तक उपस्थित रहते हुए, चित्त के साथ ही चित्त के मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाते हैं। अतः इनके नाश के उपायों की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।