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प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः॥२९॥

In Hindi:

पदपाठ : प्रसंख्याने अपि अकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेः धर्ममेघः समाधिः॥

हिंदी में अर्थ : (प्रसंख्याने) विवेकख्याति = सत्त्वपुरुषान्यताख्याति एवं इसकी (सर्वभावाधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व) सिद्धियों में (अपि) भी (अकुसीदस्य) रागरहित योगी को (सर्वथा) पूर्वरूपेण = दृढ (विवेकख्यातेः) विवेकख्याति हो जाने से (धर्ममेघः समाधिः) धर्ममेघ नामक समाधि सिद्ध होती है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : यदाऽयं ब्राह्मणः प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्ततोऽपि न किञ्चित्प्रार्थयते। तत्रापि विरक्तस्य सर्वथा विवेकख्यातिरेव भवति इति संस्कारबीजक्षयान्नास्य प्रत्ययान्तराण्युपद्यन्ते। तदाऽस्य धर्ममेघो नाम समाधिर्भवति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (यदा) जब (अयम्) यह (ब्राह्मणः) ब्राह्मण = ब्रह्मज्ञान निष्ठ योगी (प्रसंख्याने) विवेकख्याति और उसकी सिद्धियों में (अपि) भी (अकुसीदः) रागरहित होता है; (ततः अपि) विवेकख्याति की सिद्धियों की भी (किञ्चित्) कुछ (न प्रार्थयते) कामना नहीं करता; (तत्र अपि) उन सिद्धियों के प्रति भी (विरक्तस्य) विरक्त योगी को (सर्वथा) सब प्रकार से = पूर्णरूप से (विवेकख्यातिः) विवेकख्याति (एव) ही (भवति) होती है। (इति) इसलिये (संस्कारबीजक्षयात्) व्युत्थान काल के संस्कारों के बीजों का क्षय होने से (अस्य) इस योगी को (प्रत्ययान्तराणि) विवेकख्याति से भिन्न ज्ञान (न उपद्यन्ते) उत्पन्न नहीं होते। (तदा) उस समय (अस्य) इस योगी को (धर्ममेघो नाम) धर्ममेघ नामक (समाधिः भवति) समाधि सिद्ध होती है॥

वैदिक वृत्ति : उस विवेकख्याति = सत्त्वपुरुषान्यताख्याति के प्रवाह के मध्य में, व्युत्थान संस्कारों = भोगसंस्कारों के कारण उपस्थित होने वाले, विवेकख्याति से विपरीत ज्ञानों की निवृत्ति हेतु योगी द्वारा जब उन व्युत्थान संस्कारों के नाश हेतु प्रयत्न किया जाता है, तो योगी के चित्त में इस सत्त्वपुरुषान्यताख्याति विषयक प्रवाह का नैरन्तर्य बनने लगता है अर्थात् योगी के चित्त में इस विषयक एकाग्रता स्थापित होने लगती है। इस सत्त्वपुरुषान्यताख्याति से शास्त्रकार का अर्थ है — सत्त्व अर्थात् बुद्धि (= चित्त) और पुरुष के भेदज्ञान का साक्षात्कार होना। अर्थात् इस अवस्था में योगी पुरुष को जड़ चित्त एवं प्रकृति और इनसे सर्वथा भिन्न चेतन पुरुष के भेदज्ञान की प्राप्ति होती है, और अन्तर्मुखी हुआ योगी अपने आत्मस्वरूप को जानने वाला हाेता है। इस अवस्था की प्राप्ति पर योगी को सत्त्वपुरुषान्यताख्याति के बल से दो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं — (१) सर्वभावाधिष्ठातृत्व, और (२) सर्वज्ञातृत्व। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि इस अवस्था में प्रसंख्यान = सत्त्वपुरुषान्यताख्याति के होने पर, उसके फल = उपर्युक्त सिद्धियों के प्रति भी रागरहित होने पर “सर्वथा विवेकख्याति” की प्राप्ति होती है, जिसके परिणामस्वरूप योगी को धर्ममेघ नामक समाधि प्राप्त होती है।

विभूतिपाद ३.४९ में प्रतिपादित दोनों सिद्धियों की प्राप्ति योगी को “सर्वथा विवेकख्याति” की अवस्था से पूर्व इसी अवस्था में होती है, अर्थात् जब व्युत्थान संस्कारों के नाश होने से, विवेकख्याति से भिन्न ज्ञानों का क्रम अवरुद्ध होने लगता है। परन्तु शास्त्रकार ने इन सिद्धियों को भी कैवल्यप्राप्ति में बाधक मानकर उनके प्रति भी वैराग्य के सम्पादन को कहा है, क्योंकि इन सिद्धियों से भी वैराग्य होने पर ही दोषों के बीज अविद्यादि क्लेशों का नाश सम्भव होता है। इस स्थिति अर्थात् अविद्यादि क्लेश नाश को धर्ममेघ समाधि का परिणाम अगले सूत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है।

अतः “सर्वथा विवेकख्याति” की प्राप्ति हेतु योगसूत्र ३.४९ में प्रतिपादित सिद्धियों में भी रागरहित स्थिति का होना आवश्यक है।

कुछ भाष्यकारों ने इस सूत्र में “सर्वथा विवेकख्याति” के परिणाम स्वरूप होने वाली धर्ममेघ समाधि को असम्प्रज्ञात समाधि कहा है। परन्तु यह मान्यता योगदर्शन की अन्तःसाक्षी से विपरीत है। योगसूत्र १.२ की व्याख्या में महर्षि व्यास कहते हैं —“चितिशक्तिरपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमा दर्शितविषया शुद्धा चानन्ता च सत्त्वगुणात्मिका चेयमतो विपरीता विवेकख्यातिरिति। अतस्तस्यां विरक्तं चित्तं तामपि ख्यातिं निरुणद्धि। तदवस्थं संस्कारोपगं भवति। स निर्बीजः समाधिः। अर्थात् चितिशक्ति = चेतन पुरुष अपरिणामी, अप्रतिसंक्रमा, चित्त द्वारा दिखाये जाने वाले विषयों का द्रष्टा और उन विषयों से भी उपरत हो जाने वाला, शुद्ध और अन्त अर्थात् नाश रहित है। दूसरी ओर इस चेतनशक्ति से विपरीत स्वभाव वाली, चित्त के सत्त्वस्वरूप में प्राप्त बुद्धिवृत्ति रूप विवेकख्याति है। इसलिए विवेकख्याति के प्रति विरक्त हुआ चित्त, उस विवेकख्याति का भी निरोध कर देता है। इस निरोध अवस्था वाला चित्त संस्कारमात्र शेष स्थिति वाला होता है। वह अवस्था निर्बीज समाधि है।” अतः “सर्वथा विवेकख्याति” की अवस्था भी सत्त्वगुण विशिष्ट चित्त की उत्कृष्ट अवस्था है, परन्तु यह संस्कारमात्र शेष अवस्था नहीं है। इस “सर्वथा विवेकख्याति” का अभिप्राय है कि योगी के चित्त में विवेकख्याति से विपरीत अन्य किसी ज्ञान का उत्पन्न न होना। जब तक व्युत्थान संस्कारों के कारण विवेकख्याति से भिन्न ज्ञान उत्पन्न होते रहते हैं, तब तक सर्वथा = पूर्णरूपेण विवेकख्याति की स्थिति नहीं होती। जब योगी के चित्त में इस “सर्वथा विवेकख्याति” की अवस्था प्राप्त हो जाती है, तो इस काल में होने वाली समाधि को धर्ममेघ नामक समाधि कहा जाता है। इस अवस्था में “विवेकख्याति”, जो कि सत्त्वगुण विशिष्ट चित्त की उत्कृष्ट अवस्था होती हुई भी चितिशक्ति = चेतन पुरुष से सर्वथा विपरीत एवं इसकी अपेक्षा हेय है, के निरन्तर बने रहने से यह धर्ममेघ नामक समाधि अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चतम अवस्था ही है।

महर्षि पतञ्जलि ने अगले सूत्र में इस धर्ममेघ समाधि का फल क्लेश और कर्मों की निवृत्ति कहा है। अर्थात् धर्ममेघ समाधि की अवस्था तक क्लेश और कर्मों की निवृत्ति न होने से, चित्त में उनकी स्थिति बनी रहती है। इसीप्रकार योगसूत्र ४.३१ में भी धर्ममेघ समाधि की अवस्था वाले योगी के लिए कहा है कि “सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्यात् ज्ञेयमल्पम्” — अर्थात् ज्ञान के अत्याधिक हो जाने से जानने योग्य विषय अल्प = थोड़े रह जाते हैं। इस अवस्था में ज्ञानप्रधान प्रमाण वृत्ति से जानने योग्य विषयों का रह जाना, प्रमाणित करता है कि यह सर्ववृत्तिनिरोध की अवस्था नहीं है। अतः धर्ममेघ समाधि सम्प्रज्ञात समाधि ही सिद्ध होती है।

यहाँ साधक को संस्कारमात्रशेष अवस्था को समझना चाहिए जिसे निर्बीज समाधि की स्थिति कहा गया है। इस विषय में महर्षि पतञ्जलि कहते हैं — “विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः” (योग० १.१८) अर्थात् सभी वृत्तियों के निरोध के कारण परवैराग्य के अभ्यास से होने वाली संस्कारशेष रूप चित्त की स्थिति असम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है। इस सूत्र की व्याख्या में महर्षि व्यास कहते हैं — “सर्ववृत्तिप्रत्यस्तमये संस्कारशेषो निरोधश्चित्तस्य समाधिरसंप्रज्ञातः।” अर्थात् सभी वृत्तियों के निरोध हो जाने पर संस्कारमात्र शेष वाली चित्त की निरोध रूप असम्प्रज्ञात समाधि है। दूसरी ओर “सर्वथा विवेकख्याति” की स्थिति में चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध नहीं होता किन्तु विवेकख्याति का विघ्नरहित निरन्तर प्रवाह बना रहता है। इसीप्रकार चित्त के निरोध परिणाम को योगसूत्र ३.९ में स्पष्ट किया है, जिसे जिज्ञासु पाठक यथास्थान देखें।

अतः चित्त में विवेकख्याति का पूर्णरूपेण प्रवाह बने रहने से होने वाली धर्ममेघ समाधि, सर्ववृत्ति- निरोध न होने से, सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है।