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ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः॥३०॥

In Hindi:

पदपाठ : ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः॥

हिंदी में अर्थ : (ततः) उस धर्ममेघ समाधि की सिद्धि से (क्लेशकर्मनिवृत्तिः) अविद्यादि क्लेशों, तथा शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्मों की निवृत्ति हो जाती है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : तल्लाभादविद्यादयः क्लेशाः समूलकाषं कषिता भवन्ति। कुशलाकुशलाश्च कर्माशयाः समूलघातं हता भवन्ति। क्लेशकर्मनिवृत्तौ जीवन्नेव विद्वान्विमुक्तो भवति। कस्मात् ? यस्माद्विपर्ययो भवस्य कारणम्। नहि क्षीणविपर्ययः कश्चित्केनचित्क्वचिज्जातो दृश्यत इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (तत् लाभात्) उस धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति होने से (अविद्यादयः क्लेशाः) अविद्यादि पाँचों क्लेश (समूलकाषम्) समूल = अपने कारण सहित (कषिता भवन्ति) नष्ट हो जाते हैं; (च) और (कुशलाकुशलाः कर्माशयाः) पुण्य-पापात्मक एवं मिश्रित कर्माशय (समूलघातम् हता भवन्ति) समूल = अपने कारण क्लेशों / दोषों सहित नष्ट हो जाते हैं। (क्लेशकर्मनिवृत्तौ) क्लेश और कर्मों की निवृत्ति होने पर (विद्वान्) विद्वान् योगी पुरुष (जीवन् एव) जीवित रहता हुआ ही (विमुक्तः) मुक्त (भवति) हो जाता है। (कस्मात्) किस कारण से ? (यस्मात्) क्योंकि (विपर्ययः) मिथ्याज्ञान = विपरीत ज्ञान ही (भवस्य) संसार = जन्म-मरण रूपी संसारचक्र का (कारणम्) कारण है। (क्षीणविपर्ययः) नष्ट हुई अविद्या वाला (कश्चित्) कोई विद्वान्, (केनचित्) किसी के द्वारा, और (क्वचित् जातः) कहीं भी उत्पन्न हुआ, (हि) निश्चयपूर्वक (न दृश्यते इति) नहीं देखा जाता॥

वैदिक वृत्ति : योगी अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चतम अवस्था धर्ममेघ समाधि में पहुँच गया है; और इस अवस्था प्राप्ति का यह लाभ होता है कि उसके चित्त में उपस्थित अविद्यादि क्लेश और कुशल-अकुशल कर्म निवृत्त हो जाते हैं। क्लेश और कर्मों की निवृत्ति यथाक्रम अर्थात् अपने-अपने कारणों की निवृत्तिपर्वूक होती है।

साधक को यह नहीं समझना चाहिए कि धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति होते ही क्लेश और कर्मों की एकसाथ निवृत्ति हो जाती है; किन्तु इस अवस्था के सम्यक् अभ्यास द्वारा शनैः शनैः यथाक्रम क्लेशों और कर्मों की निवृत्ति होती है। इस अवस्था में “सर्वथा विवेकख्याति” होने से, पूर्व व्युत्थान संस्कारों के क्षीण होने के कारण विभिन्न ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं हो रही होती, जिससे योगी के चित्त में सत्त्वपुरुषान्यताख्याति की निरन्तरता बनी रहती है। इसी ज्ञानाग्नि के प्रभाव से क्लेश और कर्मों की निवृत्ति होती है। अविद्यादि क्लेश विपर्ययवृत्ति का ही दूसरा नाम हैं, इसलिये इसकी निवृत्ति हेतु भी अभ्यास और वैराग्य का सम्पादन अनिवार्य है। अतः यहाँ धर्ममेघ समाधि का सम्यक् एवं निरन्तर अभ्यास अनिवार्य है।

अविद्यादि क्लेशों में अविद्या ही अगले चारों क्लेशों की जननी है; अर्थात् अविद्या के रहने पर ये चारों क्लेश भी रहते हैं और उसके नष्ट होने पर अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश भी नष्ट हो जाते हैं। अतः योगी के चित्त में, यथार्थ दर्शन के कारण, अविद्या रूपी क्लेश की सर्वप्रथम निवृत्ति होती है; और आगे यथाक्रम अन्य क्लेशों = दोषों की, तदुपरान्त सभी सकाम कर्मों की निवृत्ति होती है। महर्षि पतञ्जलि ने अविद्या का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कहा है — अनित्य में नित्य, अशुचि में शुचि, दुःख में सुख, और अनात्मा में आत्मा का ज्ञान होना, अविद्या है। (योग० २.५)। वस्तुतः अविद्या का क्षेत्र बहुत व्यापक है; यह जानने योग्य सभी पदार्थों यथा आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग रूप इन सभी प्रमेयों के विषय में होती है। योगी धर्ममेघ समाधि में उपर्युक्त सभी विषयों = प्रमेयों का साक्षात्कारपूर्वक यथार्थज्ञान प्राप्त करता हुआ, विद्या के यथार्थ स्वरूप को जानता है, जिससे वह अविद्या रूपी क्लेश को समूल नष्ट करने में समर्थ होता है, अर्थात् अविद्या अपने मूल = कारण सहित (= अपने संस्कारों सहित) नष्ट हो जाती है। अविद्या रूपी जननी के नष्ट होने से अन्य क्लेश = अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश भी निवृत्त हो जाते हैं। इन चारों क्लेशों का मूल कारण अविद्या थी, और अविद्या रूपी कारण के निवृत्त होने पर, ये भी निवृत्त हो जाते हैं।

इन राग, द्वेष, मोह रूप दोषों के नष्ट हो जाने पर, योगी के कर्मों की भी निवृत्ति हो जाती है। यहाँ निवृत्त होने वाले कर्म, सकाम कर्म हैं, जिसे महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ४.७ में “त्रिविधमितरेषाम्” कहा है, अर्थात् सभी शुभ, अशुभ और मिश्रित कर्म जो अयोगी पुरुषों द्वारा किये जाते हैं, वे निवृत्त हो जाते हैं। योगी द्वारा कृत अशुक्ल-अकृष्ण = पुण्य-पापरहित कर्म तो वर्त्तमान जीवन में शरीरपात पर्यन्त होते ही हैं। ये कर्म क्लेशमूलक न होने से बन्धन का कारण नहीं बनते।

क्लेश और कर्मों से निवृत्त हुए ऐसे योगी के विषय में कहा है कि वह जीवित रहता हुआ ही मुक्त होता है = जीवन्मुक्त होता है, क्योंकि जन्म-मरण रूपी इस संसारचक्र का कारण मिथ्याज्ञान है, और मिथ्याज्ञान से रहित विद्वान् का जन्म किसी ने, कहीं होते हुये नहीं देखा। इस सिद्धान्त का स्वारस्य योगसूत्र २.१२ में भी है। इसी सिद्धान्त को अन्य शास्त्रकारों ने भी कहा है — “वीतरागजन्मादर्शनात्॥” न्याय ३.१.२५॥ अर्थात् विरक्त पुरुषों का जन्म नहीं देखा जाता।

देखो, महर्षि दयानन्द यजु॰ १७.१४ के भावार्थ में जीवन्मुक्त अवस्था का वर्णन करते हैं —

येऽत्र जगति विद्वत्तमा योगाधिराजा याथातथ्येन परमेश्वरं जानन्ति, ते निखिलजनशोधकाः सन्तो जीवन्मुक्तिदशायां परोपकारमाचरन्तो विदेहमुक्तिदशायां न सूर्यलोके न च पृथिव्यां नियतं वसन्ति, किन्तु ब्रह्मणि स्थित्वाऽव्याहतगत्या सर्वत्राभिविहरन्ति॥

अर्थात् जो इस संसार में सर्वश्रेष्ठ विद्वान् योगीराज यथार्थ रूप से परमेश्वर को जानते हैं, वे समस्त मनुष्यों के शुद्धिकर्त्ता होते हुए जीवन्मुक्तदशा में परोपकार करते हुए और शरीररहित मुक्तिदशा में न सूर्यलोक में और न पृथिवी पर स्थायी रूप से रहते हैं, अपितु परमेश्वर में रहकर अव्याहत गति से सर्वत्र विचरण करते हैं।

यहाँ प्रसंगतः योगसूत्र २.२६ पर व्यासभाष्य को समझना चाहिए। इस सूत्र में महर्षि पतञ्जलि मोक्ष का उपाय अविप्लवा विवेकख्याति कहते हैं। इसकी व्याख्या में महर्षि व्यास कहते हैं — “सत्त्वपुरुषान्यताप्रत्ययो विवेकख्यातिः। अर्थात् बुद्धि और पुरुष की भिन्नता ज्ञान का विवेकख्याति है।” यह अवस्था धर्ममेघ समाधि में प्राप्त हो चुकी है। आगे कहते हैं — “यदा मिथ्याज्ञानं दग्धबीजभावं वन्ध्यप्रसवं संपद्यते तदा विधूतक्लेशरजसः सत्त्वस्य परे वैशारद्ये परस्यां वशीकारसंज्ञायां वर्त्तमानस्य विवेकप्रत्ययप्रवाहो निर्मलो भवति। अर्थात् जब अविद्या दग्धबीजभाव को प्राप्त होकर कार्य सम्पादन में सामर्थ्यरहित होती है, तब अविद्यादि क्लेशों के प्रभाव से रहित, बुद्धि के उत्कृष्ट निर्मल होने पर और उत्कृष्ट वशीकार अनुभूति की अवस्था में विवेकज्ञान का प्रवाह सर्वथा शुद्ध होता है।” यहाँ क्लेश और कर्मों की निवृत्ति कही गयी है। अविद्या रूपी क्लेश के निवृत्त होने पर निर्मल विवेकज्ञान का प्रवाह बन जाता है, और अविद्यादि दोषों से सर्वथा रहित विवेकख्याति को मोक्ष का उपाय कहा है। आगे कहते हैं — “ततो मिथ्याज्ञानस्य दग्धबीजभावोपगमः पुनश्चाप्रसवः। इत्येषः मोक्षस्य मार्गः। अर्थात् उस विवेकख्याति से मिथ्याज्ञान का दग्धबीजभाव वाला हो जाना और पुनः अपने कार्य को न करना, इस प्रकार यह मोक्ष का मार्ग है।” अतः उपर्युक्त अवस्था के बाद भी उस सत्त्वपुरुषान्यताख्याति से अविद्या को दग्धबीजभाव करना शेष है, जिससे यह अपने कार्य को पुनः न कर सके। और यह कार्य असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में ही होता है, जहाँ पुरुष = जीवात्मा द्वारा परमात्म-साक्षात्कार किया जाता है और जिस अवस्था को प्राप्त कर वह कहता है — “प्राप्तं प्रापणीयम्, क्षीणाः क्षेतव्याः क्लेशा, छिन्नः श्लिष्टपर्वा भवसंक्रमः, यस्याविच्छेदाज्जनित्वा म्रियते मृत्वा च जायत इति। (व्यासभाष्य १.१६) अर्थात् प्राप्त करने योग्य प्राप्त हो गया है, क्षीण करने योग्य क्लेश नष्ट हो गये हैं, जकड़े हुए पर्वों वाला संसारचक्र छिन्न-भिन्न हो गया है, जिसके विच्छेद न होने से प्राणी उत्पन्न होकर मरता है, और मरकर जन्म लेता रहता है।” अतः आगे महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ४.३२ में सत्त्वादिगुणों के परिणामक्रम की समाप्ति को कहा है जो कि असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में ही पूर्ण होती है।

शंका :— क्या असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था से पूर्व मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती ?

समाधान :— नहीं, ऐसा सम्भव ही नहीं है। महर्षि व्यास योगसूत्र २.२७ की व्याख्या में सात प्रकार की प्रज्ञा में से एक प्रज्ञा को निम्न प्रकार से कहते हैं — “साक्षात्कृतं निरोधसमाधिना हानम्” अर्थात् ‘‘निरोध समाधि = असम्प्रज्ञात समाधि के सम्पादन द्वारा हान = मोक्ष का साक्षात्कार = प्रत्यक्ष कर लिया है।” अतः अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चतम अवस्था धर्ममेघसमाधि की प्राप्ति होने पर भी कैवल्य प्राप्त नहीं हो सकता।

शंका :— यहाँ क्लेश और कर्मों की निवृत्ति और जीवन्मुक्ति की अवस्था का प्रतिपादन देखकर, धर्ममेघ समाधि को असम्प्रज्ञात समाधि मानना चाहिए, ऐसा मानना ही शास्त्रकार की मान्यता के अनुकूल ज्ञात होता है।

समाधान :— उपर्युक्त स्थितियों को देखकर विभिन्न भाष्यकारों द्वारा, धर्ममेघ समाधि को असम्प्रज्ञात समाधि कहना, शास्त्रकार की मान्यता के अनुकूल नहीं है। इस विषय को हमने, पूर्वसूत्र की व्याख्या में भी, योगदर्शन की अन्तःसाक्षी के आधार पर स्पष्ट किया गया है। यहाँ इसे विशेष समझें —

देखो, मिथ्याज्ञान = अविद्या विपर्ययवृत्ति का ही दूसरा नाम है। महर्षि पतञ्जलि ने पूरे योगदर्शन में अविद्या के नाश को अत्यधिक महत्त्व दिया है। यहाँ अविद्या रूपी क्लेश की निवृत्ति का सीधा सा अर्थ है कि विपर्यय वृत्ति का निरोध होना, तथा पूर्व की सभी वृत्तियों के आधार पर होने वाली स्मृति वृत्ति का भी विपर्यय रहित होना। आगे कहा है कि इस विपर्यय वृत्ति से युक्त अर्थात् क्लेशमूलक कर्माशय ही वर्त्तमान और भविष्यत् जन्मों में फलप्रदान करने वाला होता है (योग० २.१२), तथा अविद्या रूपी मूल के रहने पर संचित कर्माशय का जाति, आयु और भोग रूप फल होता है। (योग० २.१३)। अतः जब धर्ममेघ समाधि के सम्यक् अभ्यासपूर्वक, विपर्यय वृत्ति = क्लेशों की निवृत्ति हो जाती है, तो योगी द्वारा सञ्चित होने वाला भावी कर्माशय भी अविद्यामूलक नहीं रहता। इसको योगी के अशुक्ल-अकृष्ण कर्मों की स्थिति कहा है। परन्तु यहाँ पर विपर्यय वृत्ति को छोड़कर अन्य प्रमाणादि वृत्तियों का निरोध नहीं हुआ है। जबकि असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति हेतु इनका निरोध भी आवश्यक है। महर्षि पतञ्जलि इस स्थिति के बाद भी अगले सूत्र में अल्प = कुछ शेष रहे ज्ञेय विषयों को कह रहे हैं, जिनका ज्ञान प्रमाणवृत्ति पूर्वक ही होगा।

इस अवस्था में भी, जो पूर्व का संचित कर्माशय है, उसके संस्कार चित्त में उपस्थित हैं, वही दग्धबीज भाव को प्राप्त होने शेष रह जाते हैं। उस अवस्था की प्राप्ति “परवैराग्य” के बिना सम्भव नहीं होती। यहाँ यह जानना चाहिए कि “सर्वथा विवेकख्याति” की प्राप्ति के क्रम में व्युत्थानकालीन संस्कारों के बीजों को क्षीण किया जा चुका है, जिसके कारण सत्त्वपुरुषान्यताख्याति के प्रवाह में अन्य ज्ञान उत्पन्न नहीं होते (योग० ४.२९ पर व्यासभाष्य)। और समाधिप्रज्ञा जनित संस्कार तो चित्त के साथ ही लय को प्राप्त हो जाते हैं, उसके लिये पृथक् पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं होती, उसका चिन्तन नहीं करना होता (योग० ४.२८ पर व्यासभाष्य)।

महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र २.२६ में कहा है “विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः॥” अर्थात् मोक्ष का उपाय विप्लवरहित विवेकख्याति है। विप्लवरहित विवेकख्याति की अवस्था यही धर्ममेघ समाधि है जिसमें पूर्व के व्युत्थान संस्कारों के कारण विवेकख्याति विचलन को प्राप्त नहीं होती। इसके सम्यक् अभ्यास से ही, आगे योगसूत्र ४.३२ में, सत्त्वादि गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति भी कही गयी है।

जहाँ तक धर्ममेघ समाधि से क्लेश और कर्मों की निवृत्ति का प्रश्न है, देखो इस विषय में बृहदारण्यकोपनिषद् में पुरुष शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है — “सर्वान् पाप्मन औषत् तस्मात् पुरुषः॥” बृहदा॰ १.४.१॥ अर्थात् सब पापों को जिस कारण जलाता है, इस कारण वह पुरुष है। इस चतुर्थ ब्राह्मण में जीवात्मा के गुणों का ही वर्णन चल रहा है, अतः पुरुष की यह व्युत्पत्ति जीवात्मा विषयक ही है। यहाँ इस धर्ममेघ समाधि की अवस्था को प्राप्त योगी, जब चित्त से भिन्न चेतन पुरुष का साक्षात्कार करता है, तो उसी अवस्था में अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हुआ जीवात्मा, अविद्यादि क्लेशों से निवृत्त होने में समर्थ होता है। यह सत्य है कि परमात्मा की सहायता के बिना यह स्थिति सम्भव नहीं है, परन्तु जीवात्मा के इस सामर्थ्य को जानकर ही महर्षि पतञ्जलि अौर महर्षि व्यास ने धर्ममेघ समाधि की अवस्था में इस स्थिति की प्राप्ति को कहा है।

योगसूत्र ३.५० पर व्यासभाष्य भी इसी मान्यता को सिद्ध कर रहा है। देखो, महर्षि व्यास कहते हैं कि — “यदास्यैवं भवति क्लेशकर्मक्षये सत्त्वस्यायं विवेकप्रत्ययो धर्मः सत्त्वं च हेयपक्षे न्यस्तं पुरुषश्चापरिणामी शुद्धोऽन्यः सत्त्वादिति। एवमस्य ततो विरज्यमानस्य यानि क्लेशबीजानि दग्धशालिबीजकल्पान्यप्रसवसमर्थानि तानि सह मनसा प्रत्यस्तं गच्छन्ति। तेषु प्रलीनेषु पुरुषः पुनरिदं तापत्रयं न भुङ्क्ते। अर्थात् जब क्लेशों और कर्माशय के क्षीण हो जाने पर (अर्थात् इस सूत्र में कथित स्थिति की प्राप्ति होने पर), इस योगी को ऐसा ज्ञान होता है कि यह विवेकख्याति = विवेकज्ञान सत्त्वगुण का धर्म है (अर्थात् पूर्वोक्त योगसूत्र ४.२९ में प्रतिपादित धर्ममेघ समाधि की अवस्था), और यह सत्त्वगुण तो जड़, परिणामी, परार्थ होने से त्याज्य कोटि में डाला गया है; और पुरुष अपरिणामी = परिणाम रहित शुद्धस्वरूप सत्त्वगुण से सर्वथा भिन्न है। तब इस प्रकार से उस विवेकख्याति से भी विरक्त होता है, और इस योगी के, चित्त में उपस्थित, क्लेशों के बीज जो जले हुए धान के बीजों के समान पुनः उगने में असमर्थ रहते हैं, वे मन = चित्त के साथ कारण में लीन हो जाते है। उनके लीन हो जाने पर पुरुष इस त्रिविध = आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तापों को फिर से नहीं भोगता।”

इस प्रकार से क्लेश, कर्म के क्षय के उपरान्त भी योगी के लिए सत्त्वगुणविशिष्ट अवस्था से भी वैराग्य (= परवैराग्य) को प्राप्त होना आवश्यक है, तभी वह गुणों के अधिकार से रहित हुआ कैवल्य को प्राप्त करता है। अतः सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चतम अवस्था धर्ममेघ समाधि की अवस्था में इस स्थिति (= क्लेश और कर्मों की निवृत्ति) का प्रतिपादन शास्त्रानुकूल ही है।

यहाँ प्रश्न यह होता है कि असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में क्या होता है ? इसको समझे बिना सारा शब्दाडम्बर व्यर्थ है। महर्षि पतञ्जलि ने सर्ववृत्तिनिरोध की अवस्था को असम्प्रज्ञात समाधि कहा है। महर्षि व्यास कहते हैं कि — “न तत्र किञ्चित्सम्प्रज्ञायत इत्यसम्प्रज्ञातः” (व्यायभाष्य १.२)। इसको हमने योगसूत्र १.२ की व्याख्या में स्पष्ट किया है। असम्प्रज्ञात समाधि के काल में सम्प्रज्ञात समाधि तक ज्ञात विषयों में से कुछ भी ज्ञात नहीं होता। चित्त की पाँचों वृत्तियों से सर्वथा रहित अवस्था, को शब्दों द्वारा व्यक्त करना सम्भव नहीं है। इस प्रकार से वृत्तिरहित चेतन पुरुष की स्थिति, उस काल में चेतन परमात्मा में होती है। इसको महर्षि व्यास ने वेदान्तसूत्र में इस प्रकार से कहा है — “चिति तन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः॥” (वेदान्त० ४.४.६)। अर्थात् जब अविद्यादि दोषों से छूट शुद्ध चैतन्यमात्र स्वरूप से जीव स्थित होता है, तभी ‘तदात्मकत्व’ अर्थात् ब्रह्मस्वरूप के साथ सम्बन्ध को प्राप्त होता है। (महर्षि दयानन्द सरस्वती, सत्यार्थप्रकाश ग्यारहवाँ समुल्लास)। अब क्लेशों और कर्मों से निवृत्त जीवात्मा आगे सत्त्वादि गुणों से भी विरक्त होता हुआ, चित्तस्थ प्रमाणादि वृत्तियों से भी रहित होता हुआ, अपने स्वरूप में स्थित होता हुआ, शुद्ध चेतन परमात्मा के साथ सम्बन्धित होता है। परन्तु यह अवस्था शाब्दज्ञान से प्रकट नहीं की जा सकती, अतः महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने इस अवस्था को शब्दरूप प्रदान नहीं किया। संसार का कोई भी प्राणी इस अवस्था को प्राप्त होकर भी इस अवस्था का वर्णन शब्द रूप से नहीं कर सकता। उस काल की अनुभूति चित्तस्थ वृत्ति रहित अवस्था है, इसलिये प्रमाणादि वृत्ति = ज्ञान रूप से एवं शब्द रूप से प्रकट नहीं होती। ‘आम मीठा है’ इन शब्दों से कोई किसी को आम की मिठास का अनुभव नहीं करवा सकता, उसी प्रकार परमात्मा से सम्बन्ध का अनुभव स्वानुभूति का विषय है, जो चित्तगत वृत्तियों से प्रतिपादित नहीं हो सकता। इसीलिये शास्त्रकारों स्पष्ट रूप से कहा है कि जड़ प्रकृति और उसके विकार चित्त से चेतन परमात्मा का ज्ञान नहीं हो सकता।

अतः धर्ममेघ समाधि रूपी अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के ही अनवरत् अभ्यास द्वारा, क्लेश और कर्मों की निवृत्ति का प्रतिपादन शास्त्रानुकूल है। आगे गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति (योग० ४.३२) असम्प्रज्ञात समाधि के सम्पादन से सम्भव होती है।

यहाँ एक और प्रश्न पर भी विचार कर लेना चाहिए कि “अविद्या आदि क्लेशों की निवृत्ति की क्या आवश्यकता है ?” इसका समाधान यह है कि अविद्या निवृत्ति के बिना आत्मा कर्मफल भोग के अनवरत चक्र में लगा रहेगा। छान्दोग्योपनिषद् में इसके लिए अतिमहत्त्वपूर्ण कारण दिया है —

... यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्य्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः॥ छान्दो॰ ८.३.२॥

अर्थात् (यथा) जैसे (अक्षेत्रज्ञाः) अपने खेतको अच्छे प्रकार से न जानने वाले और (उपरि उपरि संचरन्तः) ऊपर ऊपर जोतना बोना आदि कार्य करते हुए मनुष्य (निहितम्) अपने खेत के भीतर उपस्थित हुए (अपि) भी (हिरण्यनिधिम्) सुवर्णकोश = निधि को (न विन्देयुः) नहीं पाते हैं, (एवमेव) वैसे ही (इमाः सर्वाः प्रजाः) ये सब प्रजाएँ (अहः अहः) दिन-दिन = प्रतिदिन (गच्छन्त्यः) ब्रह्म के समीप जाती हुईं भी (एतत् ब्रह्मलोकम्) इस ब्रह्म के दर्शन को (न विन्दन्ति) नहीं पाती हैं, (हि) क्योंकि ये प्राणी (अनृतेन) अविद्या से (प्रत्यूढाः) ढके हुए हैं।

वस्तुतः तो आत्मा और परमात्मा इसी “दहर” शब्द वाच्य हृदयाकाश में एकत्र उपस्थित हैं। सुषुप्ति अवस्था में प्रतिदिन ही आत्मा, सांसारिक कामनाओं = भोगों से पृथक् होकर, परमात्मा के आश्रय स्थित होता है, परन्तु यह स्थिति परमात्म-साक्षात्कार की अवस्था नहीं कहलाती। उस अवस्था में परमात्म-सम्मिलन होता हुआ भी परमात्म-ज्ञान नहीं होता, और जीवात्मा उस अवस्था से वापिस जागृत अवस्था में आकर, पुनः चित्त की वृत्तियों के स्वरूप वाला हो जाता है।