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ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम्॥३२॥

In Hindi:

पदपाठ : ततः कृतार्थानाम् परिणामक्रमसमाप्तिः गुणानाम्॥

हिंदी में अर्थ : (ततः) उस धर्ममेघ समाधि के सिद्ध हो जाने से (कृतार्थानाम्) भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को पूर्ण कर कृतकृत्य हुये (गुणानाम्) सत्त्वादि गुणों के (परिणामक्रमसमाप्तिः) परिणाम-क्रम की समाप्ति हो जाती है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : तस्य धर्ममेघस्योदयात्कृतार्थानां गुणानां परिणामक्रमः परिसमाप्यते। न हि कृतभोगापवर्गाः परिसमाप्तक्रमाः क्षणमप्यवस्थातुमुत्सहन्ते॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (तस्य) उस (धर्ममेघस्य) धर्ममेघ समाधि के (उदयात्) उदय होने से (कृतार्थानाम् गुणानाम्) पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों का सम्पादन कर चुके सत्त्वादि गुणों के (परिणामक्रमः) परिणामक्रम की (परिसमाप्यते) समाप्ति हो जाती है। (कृतभोगापवर्गाः) पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सम्पन्न कर चुके, तथा (परिसमाप्तक्रमाः) समाप्त क्रम वाले सत्त्वादि गुण (क्षणम् अपि) क्षण भर भी (अवस्थातुम्) अवस्थित = स्थित (न हि उत्सहन्ते) नहीं रह सकते॥

वैदिक वृत्ति : धर्ममेघ समाधि के सम्यक् अभ्यास से क्लेश और कर्मों की निवृत्ति हो जाने पर योगी जीवन्मुक्त कहा गया है। इस योगी के चित्त में सत्त्वपुरुषान्यताख्याति रूप विवेकख्याति के निरन्तर प्रवाह से इस विषयक एकाग्रावस्था बनी रहती है। ऐसा योगी, जड़ एवं परिणामी प्रकृति और उसके विकारों बुद्धि आदि से सर्वथा विपरीत स्वभाव वाले अपरिणामी, चेतन पुरुष को स्वार्थ संयम द्वारा जान रहता होता है। अब इस अवस्था में आने से योगी सत्त्वादि गुणों से भी विरक्त होना आरम्भ हो जाता है, जिसे महर्षि पतञ्जलि ने “परवैराग्य” कहा है। अर्थात् पुरुषख्याति को प्राप्त योगी सत्त्वादि गुणों के प्रति भी वासना के अभाव को प्राप्त होता है। इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास योगसूत्र १.१६ की व्याख्या में कहते हैं — “दृष्टानुश्रविकविषयदोषदर्शी विरक्तः पुरुषदर्शनाभ्यासात्तच्छुद्धिप्रविवेकाप्यायित-बुद्धिर्गुणेभ्यो व्यक्ताव्यक्तधर्मकेभ्यो विरक्त इति। अर्थात् दृष्ट और आनुश्रविक विषयों में दोष दर्शन से, विषयों से विरक्त योगी, पुरुष दर्शन के अभ्यास से शुद्धि = निर्मलता के द्वारा प्रकृष्ट विवेकज्ञान से विकसित बुद्धि वाला होकर अभिव्यक्त धर्म वाले और अनभिव्यक्त धर्मवाले सत्त्व, रज और तम गुणों से विरक्त हो जाता है। ” यहाँ महर्षि व्यास परवैराग्य की प्राप्ति के क्रम को स्पष्ट कर रहे हैं, जो इस प्रकार है — “अपर वैराग्य को प्राप्त योगी पुरुषदर्शन = आत्मसाक्षात्कार के अभ्यास से ................ ” यह स्थिति धर्ममेघ समाधि में अब तक प्राप्त हो गयी है; आगे “ ......... शुद्धि = निर्मलता के द्वारा प्रकृष्ट विवेकज्ञान से विकसित बुद्धि वाला होकर .......... ”, पूर्व सूत्र में ज्ञान की अत्यधिकता और ज्ञेय विषयों / पदार्थों की अल्पता कही गयी है, इन अल्प ज्ञेय पदार्थों / विषयों के ज्ञान को भी इस धर्ममेघ समाधि के सम्यक् अभ्यास से प्राप्त कर प्रकृष्ट विवेकज्ञान को प्राप्त करना होता है। यदि जानने योग्य किसी विषय में अज्ञता रह जाती है, तो आगे की अवस्था प्राप्ति में बाधा होगी; आगे “ .......... व्यक्त धर्मवाले और अभिव्यक्त धर्म-वाले सत्त्व, रज और तम गुणों से विरक्त हो जाता है।” अर्थात् पुरुषख्याति के सम्यक् अभ्यास पूर्वक योगी सत्त्वादि गुणों की कार्यावस्था और मूल सत्त्वादि गुणों के प्रति भी विरक्त हो जाता है।

परन्तु मात्र गुणों के प्रति तृष्णारहित हो जाने से सत्त्वादि गुणों का परिणामक्रम समाप्त नहीं हो जाता। उसके लिये आगे का पुरुषार्थ अनिवार्य है। इस परवैराग्य के अभ्यास से पुरुष प्रमाणादि वृत्तियों को निरुद्ध करता हुआ असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील हो जाता है। उस असम्प्रज्ञात समाधि में सर्ववृत्तिरहित हुआ जीवात्मा = चेतन पुरुष अपने स्वरूप में स्थित होता हुआ परमात्मा के स्वरूप में स्थित होता है, और इस प्रकार से परमात्म-साक्षात्कार को प्राप्त कर परम चेतन सत्ता परमात्मा के सहाय से अपने यथार्थ स्वरूप को भी जानता है। अब तक उस योगी का आत्मविषयक साक्षात्कार चित्त के आलम्बन के बल पर था, परन्तु अब उसका स्वरूपसाक्षात्कार प्रकृति के सभी विकारों से सर्वथा पृथक्, चेतन परमात्मा के आलम्बन से है और यही स्थिति उसका अन्तिम लक्ष्य है, जिसे स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास योगसूत्र १.१६ की व्याख्या में कहते हैं — “यस्योदये योगी प्रत्युतिदख्यातिरेव मन्यते—प्राप्तं प्रापणीयम्, क्षीणाः क्षेतव्याः क्लेशाः, छिन्नः श्लिष्टपर्वा भवसंक्रमः, यस्याविच्छेदाज्जनित्वा म्रियते मृत्वा च जायत, इति। अर्थात् जिस ज्ञानप्रासाद के उदय होने पर, परमात्मदर्शी योगी यह मानता है कि प्राप्त करने योग्य प्राप्त हो गया है, क्षीण करने योग्य क्लेश नष्ट हो गये हैं, जकड़े हुए = मिश्रित पर्वों वाला जन्म-मरण रूप संसारचक्र छिन्न-भिन्न हो गया है, जिसके छिन्न-भिन्न न होने से प्राणी जन्म लेकर मरता है, और मरकर फिर जन्म लेता है।”

इस रहस्य को महर्षि व्यास ने योगसूत्र २.२४ की व्याख्या में भी कहा है — “सा तु पुरुषख्याति ............... न पुनरावर्त्तते॥ अर्थात् जब वह बुद्धि पुरुषख्याति = पुरुष-साक्षात्कार पर्यन्त अन्तिम कार्य निष्ठा को प्राप्त हो जाती है, तब अपने कार्य रूपी अधिकार के समाप्त होने से तथा विवेकख्याति द्वारा अविद्या की निवृत्ति होने पर बन्धन के कारण के न रहने से पुरुष के साथ फिर से संसारचक्र में प्रवृत्त नहीं होती।

अतः चित्त = बुद्धि के अपने कारण मूल प्रकृति में लीन होने से पूर्व, पुरुषख्याति होने की अनिवार्यता है। धर्ममेघ समाधि में होने वाली सत्त्वपुरुषान्यताख्याति से क्लेश और कर्मों की निवृत्ति तो होती है, परन्तु परमात्म-साक्षात्कार की अवस्था नहीं बनती। वह तो असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में ही जीवात्मा द्वारा स्वाश्रय से ही होता है। देखो, वेद में भी कहा है कि — “तमे॒व वि॑दि॒त्वाति॑मृ॒त्युमे॑ति॒ नान्यः पन्था॑ विद्य॒तेऽय॑नाय॥ यजु॰ ३१.१८॥ अर्थात् परमात्म-ज्ञान के बिना मृत्यु को पार पाने का कोई अन्य मार्ग नहीं है।”

इस प्रकार सत्त्वादि गुणों के प्रति वैराग्य को प्राप्त योगी असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में परमात्म-साक्षात्कार करता है, जिससे उस योगी की कृतकृत्यता होती है, और इस प्रकार उसके भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों का सम्पादन हो जाने से, ऐसे पुरुषों के सत्त्वादि गुणों का परिणामक्रम समाप्त हो जाता है।

परिणामक्रम समाप्ति के विषय में योगसूत्र २.२७ की व्याख्या में तीन प्रकार की चित्तविमुक्ति को समझना चाहिए, जो कि निम्नप्रकार से प्रतिपादित की गई है —

(१) बुद्धि, पुरुष हेतु अपने भोग और अपवर्ग रूपी कार्य का सम्पादन कर चुकने से, समाप्त अधिकार वाली = कृतकृत्य हो गयी है।

(२) जैसे पर्वत शिखर से गिरे हुए पत्थर निराधार होकर, लड़खड़ाते हुए अपने कारण भूमि तल पर लीन होने के लिए अग्रसर होते हैं; वैसे ही सत्त्वादि गुण भी प्रलयाभिमुख होकर उस चित्त के साथ अव्यक्त प्रकृति में लीन हो जाते हैं; और उस योगी पुरुष के प्रयोजन का अभाव होने से विलीन हुए = लय को प्राप्त हुए सत्त्वादि गुणों की फिर से उत्पत्ति = अभिव्यक्ति नहीं होती। और

(३) इस अवस्था में योगी पुरुष सत्त्वादि गुणों के सम्बन्ध से रहित हुआ आत्मस्वरूप से प्रकाशित, सभी प्रकार के मलों से रहित = निर्मल केवली = चित्तवृत्ति की प्रतीति से रहित हो जाता है।

ये तीनों प्रकार की चित्तविमुक्ति की अवस्थायें गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति को ही दर्शा रही हैं, और गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति परमात्म-साक्षात्कार से पूर्व की अवस्था में किसी प्रकार से सम्भव नहीं होती। अतः पुरुषख्याति की उपर्युक्त स्थिति असम्प्रज्ञात समाधि में ही सम्भव होती है।

शंका :— आपने पूरे योगदर्शन में कई स्थानों पर यह कहा है कि असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में ही चेतन जीवात्मा द्वारा ही चेतन परमात्मा का साक्षात्कार होता है, और यह परमात्म-साक्षात्कार चित्त के आलम्बन से अर्थात् चित्तगत नहीं होता। जबकि महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने ऐसा कहीं नहीं कहा। इस विषय में शास्त्रों के क्या प्रमाण हैं।

समाधान :— भाष्यकार महर्षि व्यास के काल तक जनसामान्य में वेदादि सत्यशास्त्रों का पठन-पाठन होता था; उनमें परमात्मज्ञान विषयक भ्रान्तियाँ वर्तमान काल के समान नहीं थी। ब्रह्मविद्या विधायक उपनिषदों में इस विषय को ऋषियों ने स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है, अतः ऐसे किसी कथन की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं हुई होगी। महाभारत काल के पश्चात् जब वेदादि सत्यशास्त्रों का पठन-पाठन क्षीण होता हुआ समाप्त सा हो गया और अविद्वानों द्वारा वेद विरुद्ध मान्यताओं को ही प्रचारित एवं प्रसारित किया गया तथा इन शास्त्रों के भी मिथ्या अर्थों को ही कहा जाने लगा तो ऐसे काल में परमात्म-साक्षात्कार के विषय में सर्वाधिक भ्रान्तियाँ उत्पन्न हो गयी। अतः इस विषय में उपनिषदों के निम्न प्रमाण द्रष्टव्य हैं —

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ केन० १.५॥

अर्थात् जो मन से ‘इयता’ करके मन में नहीं आता, जो मन को जानता है, उसकी को तू ब्रह्म जान, उसकी की उपासना कर। जो उससे भिन्न जीव और अन्तःकरण है, उसकी उपासना ब्रह्म के स्थान पर मत कर॥

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो ............. ॥ केनो॰ १.३॥

अर्थात् उस ब्रह्म को न आँख ग्रहण करती, न वाणी उसका कथन कर सकती, न मन से वह प्राप्त होता अर्थात् उस ब्रह्म में मन से भी गति नहीं होती .....।

नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुसा। अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते॥ कठो॰ ६.१२॥

अर्थात् वह ब्रह्म न तो वाणी आदि कर्मेन्द्रियों से, न मन से, और न नेत्रादि ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त हो सकता। किन्तु उस ब्रह्म की सत्ता है, फिर वह ब्रह्म किस प्रकार से प्राप्त हो सकता है ?

यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कदाचनेति॥ तै॰ २.४॥

अर्थात् जिस परमात्मा को प्राप्त न होके मन के सहित वाणी निवृत्त हो जाती है। उसी ब्रह्म के आनन्दस्वरूप को प्राप्त होकर पुरुष कदापि भयभीत नहीं होता।

इसी प्रकार महर्षि याज्ञवल्क्य जनक की सभा में गौतम उद्दालक के प्रश्न “अन्तर्यामी पुरुष कौन है?” का उत्तर देते हुये कहते हैं —

यो मनसि तिष्ठन्मनसोऽन्तरो यं मनो न वेद यस्य मनः शरीरं यो मनोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः॥ बृहदा॰ ३.७.२०॥

अर्थात् जो मन में रहता हुआ भी मन से अन्तर अर्थात् बाह्य है। जिसको मन नहीं जानता है। जिसका मन शरीर है। जो अभ्यन्तर और बाहर स्थित हो मन का शासन करता है। जो आपका आत्मा है, जो अमृत है। वही यह अन्तर्यामी है। इससे पूर्व की कण्डिकाओं में महर्षि याज्ञवल्क्य उस ब्रह्म को प्राण, चक्षु, वाणी, श्रोत्र आदि का भी नियन्ता कहा है, परन्तु ये सभी उसको नहीं जानते। इस प्रकरण के अन्त में कहते हैं —

... अदृष्टो द्रष्टाऽश्रुतः श्रोताऽमतो मन्ताऽविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति विज्ञातैष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्त्तं..॥ बृहदा॰ ३.७.२३॥

अतः वह कैसा है? (अदृष्टः) किसी अन्य ने उसको न देखा, न देखते हैं, न देखेंगे अर्थात् वह चक्षु इन्द्रिय का विषय नहीं है, परन्तु (द्रष्टा) स्वयं जो सबको देखने वाला है; पुनः (अश्रुतः) जो किसी से सुना नहीं जाता, परन्तु (श्रोता) जो सबको सुनता है; (अमतः) जो किसी से मन द्वारा मनन नहीं किया जाता परन्तु (मन्ता) जो सब का मनन करता है; (अविज्ञातः) जो जाना नहीं जाता, परन्तु (विज्ञाता) जो सबको अच्छी प्रकार से जानता है; (अतः) इसलिये इस अन्तर्यामी से (अन्यः) अन्य कोई (द्रष्टा न अस्ति) द्रष्टा नहीं है, (अतः) इस अन्तर्यामी से (अन्यः) अन्य कोई (श्रोता न अस्ति) श्रोता नहीं है, (अतः अन्यः मन्ता न अस्ति) इससे अन्य कोई मंता नहीं है, (अतः अन्यः विज्ञाता न अस्ति) इससे अन्य कोई विज्ञाता नहीं है। जो स्वयं अदृष्ट, अश्रुत, अमत, अविज्ञात है, वही अन्तर्यामी है। वह कैसा है? (अमृतः) अमृत वाला है, फिर (ते आत्मा) तेरा, मेरा सबका आत्मा है, (एषः) यही वह (अन्तर्यामी) अन्तर्यामी है। (अतः) इस विज्ञान से (अन्यत्) अन्य जो विज्ञान है वह (आर्तम्) दुःखग्रस्त है।

इसी प्रसंग में आगे गार्गाी के ब्रह्म विषयक प्रश्न का उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं —

स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितम-स्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरसमगन्धमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यं न तदश्नाति किंचन न तदश्नाति कश्चन ॥ बृहदा॰ ३.८.८॥

अर्थात् हे गार्गि! ब्रह्मवादी लोग निश्चय करके उस इसको अक्षर कहते हैं। वह न स्थूल है, न अणु है, न ह्रस्व है, न दीर्घ है, न लोहित है, वह अस्नेह, अच्छाय, अतम, अवायु, अनाकाश, असङ्ग, अरस, अगन्ध, अचक्षुष्क, अश्रोत्र, अवाक्, अमना, अतेजस्क, अप्राण, अमुख, अमात्र, अनन्तर और अबाह्य है। न वह भोक्ता है, न उसका कोई भोक्ता है।

इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद् के भूमा प्रकरण में सनत्कुमार नारद को ब्रह्मविद्या का उपदेश करते हुए कहते हैं —

स यो मनो ब्रह्मेत्युपासते यावन्मनसो गतं तत्रास्ययथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपासते .....॥ ॥छान्दो॰ ७.३.२॥

अर्थात् वह जो मन को ब्रह्म की प्राप्ति का साधन समझ, मन के धर्मों को विचारता है, जितना मन का गमन अर्थात् मनोगोचर है, वहाँ तक इस के उपासक का स्वेच्छागमन होता है, जो मन को ब्रह्मप्राप्ति का साधन समझ उपासना करता है। ....... इसी प्रकार से

स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपासते चित्तान्वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठिात् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति। यावच्चित्तस्यगतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपासते ....... ॥ छान्दो॰ ७.५.३॥

अर्थात् जो कोई ब्रह्म की प्राप्ति हेतु चित्त का अध्ययन करता है वह ध्रुव = कार्य में सदा स्थिर, प्रतिष्ठित, व्यथारहित होता है। और वह अपने समान ही निश्चयपूर्वक ध्रुव, प्रतिष्ठित और अव्यथमान जनों को प्राप्त होता है। चित्त की जहाँ तक गति है, वहाँ तक इस चित्त के अध्येता का स्वेच्छागमन होता है, जो चित्त को ब्रह्मप्राप्ति का साधन समझ उपासना करता है।

यहाँ चित्त शब्द से बुद्धि का ग्रहण है। इन दोनों वाक्यों द्वारा स्पष्ट किया गया है कि मन और बुद्धि द्वारा साधक उन्हीं पदार्थों / विषयों को प्राप्त करने में समर्थ होता है, जहाँ तक इनकी गति है, उससे अधिक नहीं। जब मन / बुद्धि का ब्रह्म में गमन नहीं तो मन से ब्रह्मप्राप्ति मानना कैसे युक्त होगा ? मन = चित्त वृत्तियों का आधार है, और प्रमाणादि वृत्ति पूर्वक ब्रह्म का शाब्दिक ज्ञान ही सम्भव होता है, ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं। वह तो असम्प्रज्ञात समाधि में चेतन आत्मा द्वारा ही होता है।

इसी प्रकार महर्षि कपिल सांख्य सूत्र ३.७५ में कहते हैं —

तत्त्वाभ्यासान्नेति नेतीति त्यागाद् विवेकसिद्धिः॥

अर्थात् तत्त्वचिन्तन से = आत्मा-परमात्मा के मनन से कि (न इति न इति) जो जो वस्तु किसी भी साधन से मन से भी अनुभव में आये वह नहीं है नहीं है तत्त्व = परमात्मा का स्वरूप, इस प्रकार से सभी विषयों का त्याग करता हुआ, विवेक की सिद्धि = परमात्मा का साक्षात्कार स्वात्मा में होता है।

यहाँ इस विषय के अन्त में हम केनोपनिषद् के ऋषि का उद्घोष प्रस्तुत करते हैं —

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।

अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्॥ केनो॰ द्वितीय खण्डः। मं॰ ३॥

अर्थात् (यस्य) जिस प्रबल तत्त्वज्ञान को प्राप्त विद्वान् का मत = सिद्धान्त ऐसा है कि ब्रह्म (अमतम्) मन से नहीं जाना जाता (तस्य) उसको ब्रह्म को (मतम्) ज्ञान है, अर्थात् उसने ब्रह्म को ठीक प्रकार से जान लिया है; और (यस्य) जिसका मत है कि मन आदि से ब्रह्म (मतम्) जाना जाता है (न सः वेद) वह उसको नहीं जानता।

अतः उपरोक्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि चित्त के आलम्बन से परमात्मा का साक्षात्कार नहीं होता वरन् आत्मा में ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है। देखो ऋग्वेद का मन्त्र क्या कहता है —

तद्विष्णोः॑ पर॒मं प॒दं सदा॑ पश्यन्ति सूरयः॑। दि॒वी॑व॒ चक्षु॒रात॑तम्॥ ऋ० १.२२.२०॥

इस मन्त्र के भावार्थ में महर्षि दयानन्द लिखते हैं “ ..... तथैव विद्वांसो विमलेन ज्ञानेन विद्यासुविचारयुक्ते शुद्धे स्वात्मनि जगदीश्वरस्य सर्वानन्दयुक्तं प्राप्तुमर्हं मोक्षाख्यं पदं दृष्टवा प्राप्नुवन्ति। .....” अर्थात् वैसे ही विद्वान् जन विमल = निर्मल ज्ञान से, विद्या और सुविचार से युक्त अपने शुद्ध आत्मा में परमेश्वर के सम्पूर्ण आनन्द से युक्त और प्राप्त करने योग्य मोक्ष नामक पद को साक्षात् करके प्राप्त करते हैं। इसी को योग की भाषा से युक्त करके इस प्रकार से कहा जा सकता है — वैसे ही विद्वान् जन विमल = निर्मल ज्ञान (= अविप्वला विवेकख्याति) से, विद्या (= धर्ममेघ समाधि से प्राप्त) और सुविचार (= अशुक्ल-अकृष्ण कर्म युक्त) से युक्त अपने शुद्ध आत्मा (= क्लेश और कर्मों से निवृत्त स्थिति को प्राप्त) में परमेश्वर के सम्पूर्ण आनन्द से युक्त और प्राप्त करने योग्य मोक्ष नामक पद को साक्षात् करके प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार से ब्राह्मण और उपनिषदों में भी कहा है —

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेच्ज्ञान आत्मनि।

ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मति॥ कठो॰ ३.१३॥

अर्थात् (प्राज्ञः) विवेकी पुरुष (वाक्) वाणी आदि इन्द्रियों को (मनसी) मन में (यच्छेत्) बाँधे, और (तत्) उस मन को (ज्ञाने आत्मनि) ज्ञानस्वरूप बुद्धि में (यच्छेत्) बाँधे, (ज्ञानम्) उस बुद्धि को (महति आत्मनि) जीवात्मा में (नियच्छेत्) बाँधे (तत्) उस महान् जीवात्मा को (शान्ते आत्मनि) शान्तस्वरूप परमात्मा में (यच्छेत्) लगावे।

तस्मादेवं विच्छान्तोदान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति ... ॥ बृहदा॰ ४.४.२३॥

अर्थात् इसलिये ऐसा ज्ञाता पुरुष शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होके आत्मा में ही आत्मा को देखता है।

अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद य एवं वेद॥ माण्डुक्यो॰ १२॥

अर्थात् मात्राओं से रहित पूर्ण ब्रह्म चतुर्थ पाद वाला, शब्दादि व्यवहार के अयोग्य है, जिसमें सब प्रपञ्चों का लय हो जाता है, सर्वकल्याणकारी, अद्वितीय है, इस प्रकार से ओम् पद वाच्य ब्रह्म में आत्मा = जीवात्मा ही प्रवेश पाता है। निज आत्मा से ही उस ज्ञानस्वरूप परमात्मा को जो इसप्रकार जानता है।

यहाँ भी आत्मा के द्वारा ही परमात्मज्ञान का स्पष्ट रूप से प्रतिपादन है। अतः उपर्युक्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि चेतन जीवात्मा ही अपने में स्थित परमपिता परमात्मा का साक्षात्कार करने में समर्थ होता है।

और देखो, महर्षि व्यास वेदान्तसूत्रों में ब्रह्मोपासना के स्थान को स्पष्ट करते हुए कहते हैं — “अन्तरा भूतग्रामवत् स्वात्मनः।” ३.३.३६॥ अर्थात् अपनी आत्मा के मध्य में ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए, क्योंकि आत्मा में ब्रह्म ऐसे ही व्यापक है, जैसे भूतसमूह में। महर्षि व्यास द्वारा इस प्रतिपादन का आधार, शास्त्रों में आत्मा में ही ब्रह्म की स्थिति कही गयी है, यथा “य आत्मनितिष्ठन्नात्मनोऽन्तरः” (शतपथ० १४.६.७.३०) जो आत्मा में ठहरा हुआ, आत्मा से भिन्न है; “तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीराः” (कठ० ५.१२) आत्मा में स्थित उस ब्रह्म को जो धीर पुरुष साक्षात् करते हैं; “एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौ” (श्वेता॰ १.१५) इस प्रकार परोक्ष ब्रह्म आत्मा में ही गृहीत होता है; “अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्ये आत्मनि तिष्ठति” (कठ० ४.१२) हृदयरूपी अगुष्ठमात्र प्रदेश में जानने योग्य ब्रह्म आत्मा के मध्य में स्थित है; और “अयमन्तरात्मन् पुरुषः” (शतपथ० १०.६.३.२) यह पूर्व वर्णित पुरुष = ब्रह्म आत्मा के अन्दर है।

इसी प्रकार महर्षि व्यास योगसूत्र ३.३५ की व्याख्या में स्पष्ट रूप से कहते हैं — “न पुरुषप्रत्ययेन बुद्धिसत्त्वात्मा पुरुषो दृश्यते। पुरुष एव तं प्रत्ययं स्वात्मावलम्बनं पश्यति।” अर्थात् बुद्धि सत्त्व के धर्मरूप पुरुष विषयक ज्ञान के द्वारा पुरुष = चेतन आत्मा नहीं देखा जाता, पुरुष ही उस ज्ञान को अपने में अवलम्बित देखता है। ऐसे में जब आत्मस्वरूप का ज्ञान ही बुद्धिगत = चित्तगत नहीं होता तो परमात्म-साक्षात्कार को चित्तगत मानना और कहना, सर्वथा अविद्या ही है।

यहाँ यह शंका होती है कि जो शास्त्रों में सूक्ष्म बुद्धि से ब्रह्मज्ञान का होना कहा है वह क्या है? उसका तात्पर्य यह है कि पहले वेदादि शास्त्रों द्वारा ही परमात्मा का ज्ञान होता है, बुद्धि आदि की शुद्धि के बिना, निर्मल ज्ञान के बिना, सूक्ष्म विषयों का ग्रहण नहीं हो सकता। आरम्भ में तो शब्दादि प्रमाणों से ही आत्मा और परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। परन्तु इस प्रकार से प्राप्त परमात्म-ज्ञान परमात्म-साक्षात्कार नहीं होता। ऐसे शाब्दिक ज्ञान से युक्त संसार में बहुत से विद्वान् होते हैं, इससे परमात्म-साक्षात्कार की योग्यता सिद्ध नहीं हो जाती। परमात्म-साक्षात्कार हेतु तो महर्षि पतञ्जलि द्वारा प्रतिपादित मार्ग ही अपनाना होगा, वरना हम भी इस संसार से ब्रह्मज्ञान के बिना ही परायण कर जायेंगे और याज्ञवल्क्य के शब्दों में कृपण होंगे —

यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात्प्रैति सा कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वाऽस्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः॥ बृहदा॰ ३.८.१०॥

अर्थात् हे गार्गि! जो इस अक्षर ब्रह्म को न जानकर इस लोक में होम और यज्ञ करता है, और अनेक सहस्र वर्षों तक तप करता है, उसका वह कर्म अन्तवाला होता है। हे गार्गि! निश्चय से, इस अक्षर ब्रह्म को न जानकर इस लोक से जो सिधार जाता है वह कृपण है और जो ही इस अक्षर ब्रह्म को जानकर इस लोक से सिधारता है वही ब्राह्मण है। अस्तु

अब यहाँ प्रसगतः इस प्रश्न पर भी शास्त्रकारों का सिद्धान्त जान लेना चाहिए कि “स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीरों में बद्ध जीवात्मा के लिए, परमात्म-साक्षात्कार हेतु शरीर में कौन सा स्थान है ?” देखो, परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, वह जीवात्मा को सर्वत्र ही प्राप्त है; वह सर्वस्थान में जीवात्मा को सर्वदा = सर्वकाल में ही प्राप्त है। छान्दोग्योपनिषद् के भूमा प्रकरण में नारद को उपदेश देते हुए सनत्कुमार कहते हैं —

स एवाधस्तान् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात् स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदᳬ सर्वम् ....... ॥ १॥ अथात आत्माऽदेश एवात्मैवाऽधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदᳬसर्वमिति। स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वाराड्भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवत्यथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्यराजानस्तेक्षय्यलोका भवन्ति तेषाᳬ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥२॥ छान्दोग्योपनिषद् ७.२५.१-२॥

अर्थात् वह ब्रह्म नीचे, वही ऊपर, वही पश्चिम, वही पूर्व, वही दक्षिण, वही उत्तर, वही इस सम्पूर्ण भुवन में प्रतिष्ठित है ..... ॥ १॥ और आगे अब आत्मादेश कहा है —

आत्मा ही नीचे, आत्मा ही ऊपर, आत्मा ही पश्चात्, आत्मा ही आगे, आत्मा ही दक्षिण्ा, आत्मा ही उत्तर, आत्मा ही सर्वत्र व्याप्त है। वही यह विद्वान् उसको पाता है, जो ऐसा देखता, मनन करता, ऐसा जानता हुआ है; और जो आत्मरति = परमात्मा में रमण, आत्मक्रीड = परमात्मा में क्रीडा, आत्ममिथुन = परमात्मा से योग है, जिसका उसको परमात्मा से ही आनन्द प्राप्त होता है; ऐसा योगी सुख का राजा होता है, उसकी सब लोकों में स्वचन्छ गति होती है, और जो इस विज्ञान से विपरीत जानते हैं, वे अन्यों की प्रजा होते अर्थात् कामादि के अधीन हो सर्वदा इस संसार के वशवर्त्ती होते हैं; वे नश्वर लोक वाले होते हैं और न ही उनका सब लोकों में स्वेच्छा से गमन होता है॥ ऐसे योगी के लिये कहा है —

न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताᳬसर्वᳬ ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति॥

छान्दो॰ ७.२६.२॥

अर्थात् वह ऐसा ब्रह्मदर्शी पुरुष मृत्यु को नहीं देखता, तीनों प्रकार के रोगों को नहीं देखता, और दुःख- भाव को नहीं देखता। वह ब्रह्मदर्शी पुरुष ब्रह्म को ही देखता है, अतः अन्त में उसकी को सब प्रकार से पाता है।

परन्तु यह स्थिति किसी भी योगी के लिए अन्तिम स्तर की है। परमात्म-साक्षात्कार हेतु आरम्भ करते हुए साधक के लिए इस स्थिति को पाना सम्भव नहीं होता। उसके लिए उपासना हेतु शास्त्रकारों ने हृदय में स्थित “दहराकाश” को कहा है। अन्तर्मुखी हुए योगी के लिए हृदयाकाश में स्थित आत्मा और आत्मा में स्थित परमात्मा ही वह स्थान है, जहाँ वह परमात्मा का साक्षात्कार करता है, वहाँ ही उपासक की परमात्मा के स्वरूप में स्थिति होती है। इसप्रकार हृदयस्थ उपासना में निम्न प्रमाण हैं —

अयमन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत् पूर्णमप्रवर्त्ति॥ छान्दो॰ ३.१२.९॥

(अयम्) यह (अन्तर्हृदये) हृदय के बीच (आकाशः) ब्रह्म है (तद् एतत्) वह यह ब्रह्म (पूर्णम्) सर्वत्र पूर्ण (अप्रवृर्त्ति) परिवर्तन रहित है।

एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् ब्रीहेर्वा यवाद्वा॥ छान्दो॰ ३.१४.३॥

(एष आत्मा) यह परमात्मा (मे) मेरे (अन्तर्हृदये) हृदय के बीच में है (ब्रीहेः) ब्रीहि से (यवाद् वा) यव से (अणीयान्) अति सूक्ष्म है॥

स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृद्ययमिति तस्माद्धृदयम् ॥ छान्दो॰ ८.३.३॥

(स वै) वह (एष आत्मा) यह आत्मा (हृर्दि) हृदय में है (तस्य) उस हृदय का (एतत् एव) यही (निरुक्तम्) निर्वचन = अर्थ है (हृदि अयम्) यह ब्रह्म हृदय में है (तस्मात्) इस हेतु (हृदयम्) यह हृदय कहलाता है।

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः॥ कठ० ६.१७॥

(अङ्गुष्ठमात्रः) अतिसूक्ष्म (अन्तरात्मा) जीवात्मा में भी व्यापक (पुरुषः) सर्वत्र पूर्ण ब्रह्म (सदा) सर्वदा (जनानां हृदये) मनुष्यों के हृदय में (सन्निविष्टः) स्थित है॥

तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा ब्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च॥ वृहदा॰ ५.६.१॥

(तस्मिन्) उस (अन्तर्हृदये) हृदय के बीच में (यथा ब्रीहिः वा यवः वा) ब्रीहि और यव से अति सूक्ष्म (सः एषः सर्वस्य ईशानः) वह यह सब का ईश्वर है, (सर्वस्य अधिपतिः) सब का अधिपति है, (सर्वम् इदम् प्रशास्ति यत् इदम् किञ्च) और जो कुछ है, उस सब को अपने शासन में रखता है॥

एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः॥ श्वेताश्वतर० ४.१७॥

(एष देवः) यह परमेश्वर (विश्वकर्मा महात्मा) महदादि जगत् को रचने वाला (सदा जनानाम्) सर्वदा मनुष्यों के (हृदये) हृदय में (सन्निविष्टः) स्थित है॥

अतः हृदय में ब्रह्म स्थित है, इसी कारण इसको ब्रह्मपुर कहते हैं। वह जैसे कि —

अथयदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकम् वेश्मदहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति॥ छान्दो॰ ८.१.१॥

इस वाक्य पर महर्षि दयानन्द ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासनाविषय में लिखते हैं — जिस समय इन सब साधनों से परमेश्वर की उपासना करके उसमें प्रवेश किया चाहे, उस समय इस रीति से करे कि (अथ यदिद०) कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में और उदर के ऊपर जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच जो गर्त है, उसमें कमल के आकार वेश्म अर्थात् अवकाशरूप एक स्थान है और उसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर भर रहा है, वह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिल जाता है। दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है॥

इन प्रमाणों से सिद्ध है कि हृदयाकाश में परमात्मा ही परिपूर्ण हो रहा है। और क्योंकि इसी हृदयाकाश में सूक्ष्मशरीर से अन्वेष्टित जीवात्मा भी रहता है, अतः यही स्थान परमात्म-साक्षात्कार का शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा है। इस दहराकाश में परमात्मा का ही ग्रहण, महर्षि व्यास वेदान्तदर्शन में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करते हैं। अस्तु।

महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध कर चुके सत्त्वादि गुणों का परिणामक्रम समाप्त हो जाता है। परन्तु योगी जीवन्मुक्त होता हुआ भी, उसका शरीर अभी भी बना हुआ है, जो कि सत्त्वादि गुणों के परिणामस्वरूप ही बनकर, उसे मिला हुआ है। अतः इस रहस्य को समझना होगा। देखो, सत्त्वादि गुणों के परिणाम = सृष्टिनिर्माण का प्रयोजन क्या है? पुरुष के भोग और अपवर्ग का सम्पादन करना, जिसे महर्षि पतञ्जलि ने “तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा॥” (योग० २.२१) कहा है। क्या यह गुणों का परिणाम = दृश्यमान जगत् सभी पुरुषों के लिये निरन्तर बना रहने वाला है? इसका उत्तर देते हुए कहा है —“कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्॥” (योग० २.२२) अर्थात् जिस पुरुष का भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन सिद्ध हो गया है, उसके प्रति सत्त्वादि गुणों का परिणाम रूप यह दृश्य जगत् नष्ट होता हुआ भी अन्य साधारण पुरुषों के प्रति नष्ट नहीं होता, और इस प्रकार से उनको भोग उपलब्ध होता रहता है। अर्थात् सत्त्वादि गुणों का परिणाम तो निरन्तर प्रति सृष्टि चलता ही रहेगा परन्तु कृतार्थ हुये पुरुष के लिये यह परिणामक्रम नहीं रहता। अतः योगी के संचित कर्माशय के आधार पर उसे इस वर्तमान शरीर की प्राप्ति हुई है, उस शरीर के रहते हुए, सत्त्वादि गुणों का परिणामक्रम चालू तो है परन्तु क्लेश, कर्म और वासनाओं के दग्धबीजभाव को प्राप्त हो जाने से इस शरीरपात के उपरान्त, सत्त्वादि गुणों का परिणाम उस मुक्त पुरुष के प्रति नष्ट हो जाता है, अर्थात् क्षण भर भी उसके लिये स्थित नहीं रहता।

यहाँ पर यह भी समझना चाहिए कि जीवन्मुक्त पुरुष के लिए गुणों का परिणामक्रम समाप्त होने पर भी गुणों का अत्यन्त बाध नहीं होता। महर्षि कपिल सांख्यसूत्रों में कहते हैं —

गुणादीनाञ्च नात्यन्तबाधः॥ सांख्य० ५.२६॥

अर्थात् सत्त्वादि गुणों उनके धर्मों का अत्यन्त बाध = उनकी अत्यन्त निवृत्ति नहीं होती। इससे यह भी जानना चाहिए कि चित्तस्थ संस्कारों के दग्धबीजभाव को प्राप्त होने पर भी उनकी अत्यन्त निवृत्ति नहीं हो सकती। क्योंकि ये संस्कार दग्धबीजभाव को प्राप्त होते हुए भी किसी भौतिक द्रव्य बीज के समान दग्ध नहीं होते, अतः जिस प्रकार किसी बीज के दग्ध होने पर वह कार्योत्पादन में कदापि, किसी भी काल में, समर्थ नहीं होता, उस प्रकार की अवस्था इन संस्कारों की नहीं होती।

देखो, महर्षि पतञ्जलि अनन्त वासनाओं के अनादित्व को सिद्ध करते हुए इनके अभाव के उपायों — हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन को योगसूत्र ४.११ में स्पष्ट करते हुए भी योगसूत्र ४.१२ में ही इनकी भविष्यत् कालीन विद्यमानता को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करते हैं। अर्थात् चित्तस्थ संस्कार / वासनाएँ अभाव को प्राप्त होती हुई भी सर्वथा नष्ट नहीं होतीं और मुक्ति की अवधि के उपरान्त अनागतलक्षण परिणाम से वर्त्तमानलक्षण परिणाम को प्राप्त हो जाती हैं।

अतः मुक्ति की अवधि के उपरान्त उन्हीं संस्कारों के आधार पर पुरुष = जीवात्मा को पुनः विभिन्न जातियों की प्राप्ति ईश्वरीय कर्मफलव्यवस्था में होती है।