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उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि॥ ७॥

In Hindi:

पदपाठ : उप। त्वा॒। अ॒ग्ने॒। दिवेदिवे। दोषाऽवस्तः। धि॒या। व॒यम्। नमः॑। भर॑न्तः। आ। इ॒म॒सि॒॥ ७॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : ऋग्वेदः अष्टक १। अध्याय १। वर्ग १। मंत्र ७।

मधुच्छन्दा ऋषिः। अग्निर्देवता। गायत्रीच्छन्दः। षड्जः स्वरः॥



महर्षि दयानन्द व्याख्या :

(उप त्वाग्ने)हे अग्ने पूज्यतमेश्वर!(दिवेदिवे)प्रतिदिनं नित्यम्(धिया)बुद्ध्या।(त्वा)त्वाम्। वयं(उपैमसि)तव उप सामीप्यम् आ सर्वतः, इमः प्राप्नुमः। तथा(दोषावस्तः)अहर्निशं निरन्तरम्(भरन्तः)ज्ञानेन प्रेमभक्तिं धारयन्तः सन्तो,(वयं)त्वां(नमः)नमस्कुर्मः। यतो भवान् सद्योऽस्मान्प्राप्नुयात्। भवत्प्राप्त्या वयं सुखिनो नित्यं भवेम॥



अत्र मन्त्रव्याख्याने सायणाचार्याध्यापकविलसनादिभिर्भौतिकाग्निमात्रस्यैव गृहीतत्वात्तद्व्याख्यान-मन्यथास्ति। कुतः? भौतिकाग्नेरनायासेन होममात्रे प्राप्तत्वान्नमस्करणीयाभावाच्चेति॥ ७॥



॥ भाषार्थ॥



(उप त्वाग्ने)हे अग्ने ईश्वर! हमको एक पूज्य आप ही हो। हम लोग(धिया)बुद्धि जो ज्ञान है इससे।(दिवेदिवे)सब दिन के लिये, आपके समीप को(त्वामुपैमसि)शरणागति को प्राप्त होते हैं।(दोषावस्तः)तथा दिन और रात्रि में, सत्य भक्तिपूर्वक आप को(वयम्)हम लोग नित्य ही(नमो भरन्तः)नमस्कार करते हैं, जिससे कृपा करके आप हमको शीघ्र प्राप्त हों। आपकी प्राप्ति से हम लोग निरन्तर सुखी हों॥



सायण, डाक्तर विलसन और वेदार्थयत्नादि के कर्त्ताओं ने इस अर्थ को जाना भी नहीं॥ ७॥



॥ अथ द्वितीयोऽर्थः॥



(उप त्वाग्ने)हे पूर्वोक्तविशेषणयुक्तेश्वराग्ने! भवन्तमुपगता नमस्कुर्वन्तः कथयन्तश्च भवन्तं नित्यं प्रार्थयामः। भवत्प्रार्थनया त्वद्रचितस्य भौतिकाग्नेः सकाशाद्वायुवृष्टिशुद्धिकरं यज्ञानुष्ठानं शिल्पविद्यामयं च प्राप्नुयाम। एतदर्थं निरन्तरं नमोऽस्तु ते॥७॥



॥ भाषार्थ॥



(उप त्वाग्ने)हे परमेश्वर अग्ने। हम लोग आपके शरणागत हैं। नित्य आपको नमस्कार और प्रार्थना करते हैं कि जो-जो आपने भौतिकाग्नि में गुण रक्खे हैं उन उन गुणों से हम लोग सुगन्धित आदि पदार्थों का होम करके वायु तथा वर्षा के जल की शुद्धि करें तथा शिल्पविद्या को भी प्राप्त हों। इसलिए और मोक्षादि सुख के लिये भी आपको निरन्तर नमस्कार करते हैं॥ ७॥